मेरी बेटी - एक छंद October 29, 2007
Posted by pryas in Uncategorized.Tags: , मेरी बेटी
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अक्सर हिन्दुसतान में लडकों को चंचल और शरारती माना जाता है और उनकी इन शरारतों पर उनके माता-पिता बडे रीझते और खुश होते हैं. और यदि एसी शरारतें लडकियाँ करें तो माता-पिता खुश होने के स्थान पर उन्हें शरारतें न करने के लिये कहते हैं.
इसी विषय पर एक छंद लिखने की कोशिश की है. अभी तक तो अन्य कवियों की कवितायें पोस्ट की हैं पर यह छंद मेरी अपनी रचना है. आपकी टिप्पणीयों की प्रतिक्षा रहेगी.
……छोटे-छोटे पैर और नन्हे-नन्हे हाथ लेके,
……ठुमक चली है जग, सब देखो दंग है,
……कभी दौडे तेज-तेज कभी दौडे धीरे से वो,
……तंग मुझे करने का, अजब ये ढंग है,
……यह देख चकित हो, कहा मेरी श्रीमती ने,
……लडकी है देखो करे, लडकों सी तंग है,
……मैने कहा रहने दो जी, ऐसे तुम मत कहो,
……गुडीया ये मेरी नहीं, लडकों से कम है.`










bahut hi pyare chand hain
बहुत खूब्……सुन्दर बहुत सुन्दर…॥
मगर मगर लड़कों से तुलना कयूं ? लड़कियों का अपना एक सुंदर व्यकति्त्व होता है,उन्हे किसी comparison की आवश्यकता नही ।
पारूल जी,
आपका कहना बिल्कुल सत्य है. लडकियों का अपना व्यक्तिव, अपना अलग वज़ूद और पहचान होती है. और वह निस्संदेह किसी से तुलना योग्य नहीं है.
वैसे मैं यहाँ लडकियों की तुलना नहीं करन चाह रहा था अपितु ये तुलना हमारे समाज, हमारे घरों में की जा रही हैं.
वाह जी वाह. आपने मन खुश कर दिया. हमारी दो लडकियाँ ही है और वे लडको से कम नही है
बहुत बढ़िया. सही है बिटिया बेटे से कम थोड़े ही है.
यह बिटिया के चित्र ने तो मोह लिया!