यह भी खूब रही

क्षणिकाएँ – जानवर

October 24, 2007 · 3 Comments

सभी क्षणिकाएँ, के.पी. सक्सेना ’दूसरे’ द्वारा रचित।

- जानवर -
(१)
जानवर की कोख से
जनते न देखा आदमी
आदमी की नस्ल फिर क्यों
जानवर होने लगी।

(२)
गो पालतू है जानवर
पर आप चौकन्ने रहें
क्या पता किस वक़्त वो
इन्सान बनना ठान ले।

(३)
पड़ोसी मर गया, अब यह खबर अखबार देते हैं
सोच लो किस तज़| में हम ज़िन्दगी का बोझ ढोते हैं,
अब तो मैं भी छोड़ता बिस्तर सुनो तस्दीक़ कर,
नाम मेरा तो नहीं था कल ’निधन’ के पृष्ठ पर।

साहित्य कुंज के आभार से

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3 responses so far ↓

  • benaam // October 25, 2007 at 5:55 pm | Reply

    नारद का तो पता नही, लेकिन ब्लाग्वानी पर तो मुझे पोस्ट दिखी, वहीं से तो आया हूँ… आपकी पिछली पोस्टें भी वह देख ली मैंने … ये लिंक तो देखिये

    http://blogvani.com/Bloggerdetail.aspx?BlogID=137

    ये आप ही हैं ना भाई साहब ?

  • pryas // October 25, 2007 at 8:50 pm | Reply

    आपका धन्यवाद.

    मेरे ब्लाग की फीड में अवाँछनीय अक्षर आने के कारण एक्स एम एल फाईल में समस्या आ गयी थी. मैंने कोशिश करके उसे ठीक कर लिया.

  • ramadwivedi // June 14, 2009 at 10:07 am | Reply

    जानवर की कोख से
    जनते न देखा आदमी
    आदमी की नस्ल फिर क्यों
    जानवर होने लगी।

    sabhi kshanikaaen bahut badhiya hain….vaise jaanvar aadmi se behtar hai…shubhakaamanaaon sahit…

    Dr. Rama Dwivedi

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