क्षणिकाएँ - जानवर October 24, 2007
Posted by pryas in हितोपदेश.Tags: क्षणिकाएँ, जानवर, नरेश, प्रयास, यह भी खूब रही, हिन्दी चिट्ठा
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सभी क्षणिकाएँ, के.पी. सक्सेना ’दूसरे’ द्वारा रचित।
- जानवर -
(१)
जानवर की कोख से
जनते न देखा आदमी
आदमी की नस्ल फिर क्यों
जानवर होने लगी।
(२)
गो पालतू है जानवर
पर आप चौकन्ने रहें
क्या पता किस वक़्त वो
इन्सान बनना ठान ले।
(३)
पड़ोसी मर गया, अब यह खबर अखबार देते हैं
सोच लो किस तज़| में हम ज़िन्दगी का बोझ ढोते हैं,
अब तो मैं भी छोड़ता बिस्तर सुनो तस्दीक़ कर,
नाम मेरा तो नहीं था कल ’निधन’ के पृष्ठ पर।









