(जटायू का बडा भाई संपाती जो प्रथम बार सूर्य तक पहुँचने के लिये उडा, पँख झुलस जाने पर समुन्द्र तट पर गिर पडा। सीता की खोज में जाने वाले वानर ऊसकी गुफा में भटक कर उसके आहर बने)
…यह भी अदा थी मेरे बडप्पन की
कि जब भी गिरूं तो गिरूं समुन्द्र के पार:
मेरे पतन तट पर गहरी गुफा हो एक-
बैठूं जहाँ मैं समेट कर अपने अधजले पँख
ताकि वे सनद रहें…
जिनको दिखा सकूं कि पहला विद्रोही थ मैं
जिसने सूर्य की चुनौती स्वीकारी थी
सूरज बेचारा तो अब भी अपनी जगह
उतना ही एकाकी वैसा ही ज्वलंत है
मैंने, सिर्फ चुनौतीयाँ स्वीकारना बेकार समझ कर
बंद कर दिया है अब!
सुखद है धीरे-धीरे बूढे होते हुए
गुफा में लेट कर समुन्द्र को पछाडें खाते हुए देखना
कभी-कभी छलाँग कर समुन्द्र पार करने का
कोई दुस्सहासी इस गुफा में आता है
कहता हूँ मैं आ तू! ओ अनुगामी तू मेरा आहार है!
(क्योंकि आखिर क्यों वे मुझे याद दिलाते हैं
मेरे उस रूप की, भूलना जिसे अब मुझे ज्यादा अनुकूल है!)
उनके उत्साह को हिकारत से देखता हुआ
मैं फिर फटकारता हूँ अपने अधजले पँख
क्योंकि वे सनद हैं
कि प्रामाणिक विद्रोही मैं ही था, मैं ही हूँ
नहीं, अब कोई संघर्ष मुझे छूता नहीं
वह मैं नहीं
मेरा भाई था जटायु
जो व्यर्थ के लिये जाकर भिड गया दशानन से
कौन है सीता?
और किसको बचायें? क्यों?
निराद्रत तो आखिर दोनों ही करेंगे उसे
रावण उसे हार कर और राम उसे जीत कर
नहीं, अब कोई चुनौती मुझे छूती नहीं
………………………
गुफा में शाँती है…
………………………
कौन हैं ये समुन्द्र पार करने के दावेदार
कह दो इनसे कि अब यह सब बेकार है
साहस जो करना था कब का कर चुका मैं
ये क्यों कोलाहल कर शाँती भंग करते हैं
देखते नहीं ये
कि सुखद हं मेरे लिये झुर्रियां पडती हुई पलकें उठा कर
गुफा में पडे-पडे समुन्द्र को देखना…

5 responses so far ↓
ज्ञानदत पाण्डेय // October 18, 2007 at 12:15 pm |
पढ़ना अच्छा लगा। अपने भी नुकीले अंश धीरे धीरे चिकने बन रहे हैं – कभी सोचते हैं तो अजीब लगता है।
समीर लाल // October 18, 2007 at 8:47 pm |
आभार भारती जी की इस सुन्दर कविता को यहाँ पेश करने के लिये.
S // November 2, 2007 at 9:09 am |
Hi,
I was going through the wordpress site and I came across it while through their link to Hindi availability. I would have liked to write a message here in Hindi. Unfortunately, I am unable to do it. My apologies for the same.
I am really glad to see a blog in Hindi. The only thing I would have like to see is no typos or spelling mistakes.
Keep up the good work.
S
pryas // November 2, 2007 at 1:38 pm |
आपका धन्यवाद,
मैंने आपका संदेश हिन्दी में लिखने की कोशिश की है, आशा है आपको अच्छा लगेगा. आप हिंदी में लिखने के लिये इस कडी का प्रयोग कर सकते हैं (http://hindini.com/tool/hug2.html)
मैं वर्डप्रैस की वैबसाईट खंगालते हुए हिन्दी की कडी पर पहुँचा. मैंने यह संदेश हिन्दी में लिखना चाहता किंतु दुर्भाग्यवश मैं लिखने में असमर्थ रहा. जिसके लिये मैं क्षमा चाहता हुँ. हिन्दी ब्लौग देखकर मुझे अत्यधिक खुशी हुई. और जिस बात कि खुशी सबसे ज्यादा हुई वह यह थी कि न तो इसमें कोई टंकण और न ही हिज्जों (spelling) मे कोई त्रुटी थी.
hares // July 17, 2008 at 12:06 pm |
theks