jump to navigation

सम्पाती - धरमवीर भारती जी की एक कविता October 18, 2007

Posted by pryas in Uncategorized.
Tags: , , , , , , , , , ,
4 comments

(जटायू का बडा भाई संपाती जो प्रथम बार सूर्य तक पहुँचने के लिये उडा, पँख झुलस जाने पर समुन्द्र तट पर गिर पडा। सीता की खोज में जाने वाले वानर ऊसकी गुफा में भटक कर उसके आहर बने)

…यह भी अदा थी मेरे बडप्पन की
कि जब भी गिरूं तो गिरूं समुन्द्र के पार:
मेरे पतन तट पर गहरी गुफा हो एक-
बैठूं जहाँ मैं समेट कर अपने अधजले पँख
ताकि वे सनद रहें…
जिनको दिखा सकूं कि पहला विद्रोही थ मैं
जिसने सूर्य की चुनौती स्वीकारी थी

सूरज बेचारा तो अब भी अपनी जगह
उतना ही एकाकी वैसा ही ज्वलंत है
मैंने, सिर्फ चुनौतीयाँ स्वीकारना बेकार समझ कर
बंद कर दिया है अब!

सुखद है धीरे-धीरे बूढे होते हुए
गुफा में लेट कर समुन्द्र को पछाडें खाते हुए देखना

कभी-कभी छलाँग कर समुन्द्र पार करने का
कोई दुस्सहासी इस गुफा में आता है
कहता हूँ मैं आ तू! ओ अनुगामी तू मेरा आहार है!
(क्योंकि आखिर क्यों वे मुझे याद दिलाते हैं
मेरे उस रूप की, भूलना जिसे अब मुझे ज्यादा अनुकूल है!)

उनके उत्साह को हिकारत से देखता हुआ
मैं फिर फटकारता हूँ अपने अधजले पँख
क्योंकि वे सनद हैं
कि प्रामाणिक विद्रोही मैं ही था, मैं ही हूँ

नहीं, अब कोई संघर्ष मुझे छूता नहीं
वह मैं नहीं
मेरा भाई था जटायु
जो व्यर्थ के लिये जाकर भिड गया दशानन से
कौन है सीता?
और किसको बचायें? क्यों?
निराद्रत तो आखिर दोनों ही करेंगे उसे
रावण उसे हार कर और राम उसे जीत कर
नहीं, अब कोई चुनौती मुझे छूती नहीं

………………………
गुफा में शाँती है…
………………………

कौन हैं ये समुन्द्र पार करने के दावेदार
कह दो इनसे कि अब यह सब बेकार है
साहस जो करना था कब का कर चुका मैं
ये क्यों कोलाहल कर शाँती भंग करते हैं
देखते नहीं ये
कि सुखद हं मेरे लिये झुर्रियां पडती हुई पलकें उठा कर
गुफा में पडे-पडे समुन्द्र को देखना…

समस्या October 18, 2007

Posted by pryas in हितोपदेश.
Tags: , , , , , , , , ,
1 comment so far

एक गाँव में एक फकीर आए। वे किसी की भी समस्या दूर कर सकते हैं। सभी लोग जल्दी से जल्दी अपनी समस्या फकीर को बताकर उपाय जानना चाहते थे। नतीजा यह हुआ कि हर कोई बोलने लगा और किसी को कुछ समझ में नहीं आया। अचानक फकीर चिल्लाए. ‘खामोश’। सब चुप हो गए। फकीर ने कहा, “मैं सबकी समस्या दूर कर दूंगा। एक साथ बोलने के बजाय सब लोग एक-एक कागज पर अपनी समस्या लिख लाएं और मुझे दें।

कुछ ही देर में फकीर के सामने कागजों का ढेर लग गया। फकीर ने कागजों को एक टोकरी में रखा और सबसे गोला बनाकर बैठ ने को कहा। गोले के बीच में टोकरी रख दी।
एक आदमी की तरफ इशारा करके कहा, “यहाँ से शुरू करके सब बारी-बारी से आएंगे और एक-एक कागज़ उठा लेंगें।” ध्यान रहे किसी को अपना कागज़ नहीं उठाना है। लोग एक-एक कर आए कागज उठा-उठा कर अपनी-अपनी जगह बैठ गए। फकीर ने कहा,”अब इस कागज़ में लिखी किसी दूसरे की समस्या पढो। अगर चाहो तो मैं तुम्हारी समस्या दूर कर दूँगा पर उसके बदले कागज़ पर लिखी समस्या तुम्हारी हो जाएगी। तुम्हें लगता है कि तुम्हारी समस्या बडी है तो उसे दूर करवाकर कागज़ पर लिखी दूसरे की छोटी-सी समस्या अपना लो। चाहो तो आपस में कागज़ बदल लो। जब तय कर लो कि अपनी समस्या के बदले कौन सी समस्या लोगे तब मेरे पास आ जाना।

लोगों ने जब कागज़ पर लिखी समस्या पढी तो वे घबरा गए। लोग एक दूसरे से कागज़ बदल-बदल कर पढ रहे और बार-बार उन्हें लगता कि उनकी समस्या तो जैसी है वैसी है, पर इस नई समस्या का सामना वे कैसे कर पाएंगे। कुछ देर में हर किसी को समझ में आ गया कि उनकी समस्या जैसी भी है उनके अपने जीवन का हिस्सा है और वे उसी का सामना कर सकते हैं। एक-एक कर के लोग चुपचाप वहाँ से चले गये।