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क्रोध पर विजय August 17, 2007

Posted by pryas in हितोपदेश.
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एक व्यक्ति के बारे में यह विख्यात था कि उसको कभी क्रोध आता ही नहीं है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हें सिर्फ बुरी बातें ही सूझती हैं। ऐसे ही व्यक्तियों में से एक ने निश्चय किया कि उस अक्रोधी सज्जन को पथच्युत किया जाये और वह लग गया अपने काम में। उसने इस प्रकार के लोगों की एक टोली बना ली और उस सज्जन के नौकर से कहा - “यदि तुम अपने स्वामी को उत्तेजित कर सको तो तुम्हें पुरस्कार दिया जायेगा।” नौकर तैयार हो गया। वह जानता था कि उसके स्वामी को सिकुडा हुआ बिस्तर तनिक भी अच्छा नहीं लगता है। अत: उसने उस रात बिस्तर ठीक ही नहीं किया।

प्रात: काल होने पर स्वामी ने नौकर से केवल इतना कहा - “कल बिस्तर ठीक था।”

सेवक ने बहाना बना दिया और कहा - “मैं ठीक करना भूल गया था।”

भूल तो नौकर ने की नहीं थी, अत: सुधरती कैसे? इसलिये दूसरे, तीसरे और चौथे दिन भी बिस्तर ठीक नहीं बिछा।

तब स्वामी ने नौकर से कहा - “लगता है कि तुम बिस्तर ठीक करने के काम से ऊब गये हो और चाहते हो कि मेरा यह स्वभाव छूट जाये। कोई बात नहीं। अब मुझे सिकुडे हुए बिस्तर पर सोने की आदत पडती जा रही है।”

अब तो नौकर ने ही नहीं बल्कि उन धूर्तों ने भी हार मान ली।

Comments»

1. संजय तिवारी - August 17, 2007

भाई यह कहना कि क्रोध नहीं आता बहुत मुश्किल है. क्रोध का जन्म इच्छा के गर्भ से होता है. और इच्छा सबके अंदर है. हमारी इच्छाएं पूरी नहीं होती तो हमें क्रोध आता है. इच्छा के रूपान्तरण की कला जो सीख जाता है शायद वह क्रोध से बच सकता है.
क्रोध दूसरे से ज्यादा अपना खुद का नुकसान करता है. इसका अहसास हमें तब होता है जब हमारा क्रोध शांत हो जाता है.

2. Pryas - August 17, 2007

संजय भाई,
आप सही कहते हैं

3. रमेश जट्ट पटेल क्रोधी - August 17, 2007

क्रोध एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, और क्रोध के कारण स्रुजन भी होता है. क्रोध अगर अत्याचार के खिलाफ हो तो क्रांति बन जाता है. क्रोध निश्चय शक्ति बढ़ाता है, और बेबसी से दूर ले जाता है. क्रोध अगर काबू में हो तो बड़ी-बड़ी कठिनाइयों पर विजय दिलाता है.

क्रोध से डरो नहीं, उसे दबाओ नहीं, सच्चाई अगर साथ है तो क्रोध के बल से एक निष्कासित सन्यासी रावण से जीत जाता है.

4. हरिराम - August 17, 2007

जिस प्रकार अन्धकार नाम की कोई चीज नहीं होती, प्रकाश के अभाव को ही अन्धकार कहा जाता है। उसी प्रकार काम,क्रोध…. नाम की कोई चीज नहीं होती, आत्मिक-पवित्रता का अभाव ही ‘काम’ तथा ‘आत्मिक-शान्ति, सहनशक्ति’ का अभाव ही क्रोध है…

5. समीर लाल - August 17, 2007

आपने मुझ पर ललित निबंध लिखा, पढ़कर हृदय गदगद हो गया. आशा है आपको भी गुस्सा नहीं आता होगा. :)

-बहुत बढ़िया कथा.