वेद प्रकाश जी की एक “डबल हास्य” कविता August 10, 2007
Posted by pryas in हास्य.trackback
एक काला आदमी
बहुत ही काला
काला स्याह
सुपर काला
जैड ब्लैक
डबल अफ्रीकन
एल्डर सन ऑफ अमावस्य
औंधे तवे का ताऊ
पहाडी कौए का पडदादा
कोयल संप्रदाय का दादू
बंगाल का काला जादू
तारकोल जिसके पैरों में भक्ति भाव से पसरता हो,
कोयला जिसका रूप रंग पाने के लिये, सदियों तक जमीन के नीचे बैठ कर तपस्या करता हो
जिसदिन उस कालानुभाव के दर्शन हुए, जमीन थमी रह गयी
अब इससे ज्यादा क्या कहुँ,
इतना कहने के बाद भी, मेरे पास शब्दों की कमी रह गयी
शादी होते ही माँ-बाप को धक्के देकर बाहर निकाल देने वाली औलाद सा कपूत,
कुल मिला कर इतना काला जितनी किसी भ्रष्ट नेता की करतूत
एक दुकान पर गया
ना शर्म ना हया
बोला - फेयर एण्ड लवली है
दुकानदार ने कहा नहीं
तो कहने लगा -
फेयर-फेयर नैस जैसी कोई और क्रीम सही
दुकानदार बोला वो भी नहीं
तो बोला - कोई और
तो जब इस बार भी गर्दन दुकानदार ने इंकार में हिलाई
तो कहने लगा - Cherry Blossom ही दे दे
कम से कम चमक तो बनी रहेगी भाई










बहुत ही काली कविता है।
मजेदार है।
बधाइ्र
हा हा!! मजा आया.
अत्यंत काला मजा आया।
बधाई
aaaaaaaaaaaaa
maza nahi aya
nice poem………..its good
it is very nice
kai log kala dekh ka dar gay the
a good kavita .aditya khush hua………..