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रामधीर सिंह दिनकर जी की बाल-कविता August 7, 2007

Posted by pryas in Uncategorized.
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एक दिन चाँद ने अपनी माता से कहा कि उसे ठंड लगती है इसलिये उसके लिये एक झिंगोला सिलवा दें. लेकिन उसकी माता के सामने समस्या यह है कि चाँद का आकार घटता-बढता रहता है तो वो नाप कैसे ले…

पढिये रामधीर सिंह दिनकर जी की यह बाल-कवित आपको बिल्कुल आपके बचपन की याद दिलायेगी

हठ कर बैठा चाँद एक दिन माता से यह बोला
सिलवा दो माँ मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला
सन सन चलती हवा रात भर जाडे में मरता हूँ
ठिठुर ठिठुर कर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूँ
आसमान का सफर और यह मौसम है जाडे का
न हो अगर तो ला दो मुझको कुर्ता ही भाडे का
बच्चे की सुन बात कहा माता ने अरे सलोने
कुशल करे भगवान लगे मत तुझको जादू टोने
जाडे की तो बात ठीक है पर मै तो डरती हूँ
एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूँ
कभी एक अंगुल भर चौडा कभी एक फुट मोटा
बडा किसी दिन हो जाता है और किसी दिन छोटा
घटता बढता रोज़ किसी दिन ऐसा भी करता है
नहीं किसी की भी आँखों को दिखलाई पडता है
अब तू ही यह बता नाप तेरा किस रोज़ लिवायें?
सी दें एक झिंगोला जो हर रोज़ बदन में आयें?

Comments»

1. बोधिसत्व - August 7, 2007

आनन्द आ गया भाई
यह कविता मैंने प्रायमरी में कभी पढ़ी थी। साधुवाद

2. mamta - August 7, 2007

बचपन मे ये कविता पढी थी और तब भी बहुत अच्छी लगी थी और आज भी बहुत अच्छी लगी।

3. अपूर्व - August 7, 2007

बहुत सुंदर…धन्यवाद…दिनकर तो हमारे सूर्य और हमारे चंद्र की ही तरह अद्वितीय हैं…वैसे मैंने बचपन में नहीं पढ़ी थी ये कविता लेकिन भविष्य के ‘बचपनों’ को ज़रूर सुनाऊँगा ताकि चाँद में चंदामामा की खोज जारी रहे. शुभकामनाएँ.

4. ghughutibasuti - August 7, 2007

बाल्य कविता यहाँ लाने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद । यदि ऐसे ही बच्चों को हिन्दी की कविता पढ़ने को मिलती रहें तो शायद उनकी रुचि हिन्दी में बनी
रहेगी । मैं तो इन कविताओं के प्रिंट आउट निकाल कर स्कूल में बच्चों को देने वाली हूँ ।
घुघूती बासूती

5. अनूप शुक्ल - August 7, 2007

अच्छी किया जोइसे यहां पोस्ट किया।

6. Annapurna - September 6, 2007

पांचवीं कक्षा में पढी थी ये कविता । आज भी उतना ही आनन्द आया

7. atulkumaar - October 1, 2007

बहुत अच्छा लगा पढ़्कर

कविता में आगे भी है कि तब चांद ने कहा कि उसके लिए पूरे ३० झिंगोले सिलवा दिये जाए.

अतुल

8. pryas - October 1, 2007

अतुल जी,
टिप्प्णी करने और कविता की आगे की पंक्तियाँ सुझाने के लिये धन्यवाद