जैमिनी हरियाणवी की एक हास्य कविता August 6, 2007
Posted by pryas in हास्य.trackback
एक दिन
एक पडोस का छोरा
मेरे तैं आके बोल्या
‘चाचा जी अपनी इस्त्री दे देयो’
मैं चुप्प
वो फेर कहण लागा:
‘चाचा जी अपनी इस्त्री दे देयो ना?’
जब उसने यह कही दुबारा
मैंने अपनी बीरबानी की तरफ करयौ इशारा:
‘ले जा भाई यो बैठ्यी’
छोरा कुछ शरमाया, कुछ मुस्काया
फिर कहण लागा:
‘नहीं चाचा जी, वो कपडा वाली’
मैं बोल्या,
‘तैन्नै दिखे कोन्या
या कपडा में ही तो बैठी सै’
वो छोर फिर कहण लगा
‘चाचा जी, तम तो मजाक करो सो
मननै तो वो करंट वाली चाहिये’
मैं बोल्या,
‘अरी बावली औलाद,
तू हाथ लगा के देख
या करैंट भी मारयै सै’










हूँ. ठीक है भाई.
मजेदार. कहां से ढूंढ लाये भाई. कुछ इसी तरह का और
जैमिनी जी की और रचनाएं भी प्रेषित करें । हम कभी उन्हें रेडियों टी वी पर सुनते थे कभी_कभी ।बढिया रचना है।
main Kanpur mein aapako sun chuka hun kavi sammelano mein, yah kavita padhakar anand aa gaya
जैमिनीजी हास्य कविता के उस दौर के हस्ताक्षर थे जब काव्य में वाक़ई गरिमामय हास्य होता था.आज ये आलम है के लाँफ़्टर चैलेंज वाले हास्य कविताएं सुना रहे हैं और हास्य काव्य मंचों पर चुटकुले सुनाए जा रहे हैं. प.गोपाल व्यास,काका हाथरसी,बेढ़ब बनारसी,से लेकर शरद जोशी और के.पी.सक्सैना तक अनूठा हास्य अब कहाँ ? आज हास्य कविता मैं नब्बे फ़ी सदी राजनीति भरी पड़ी है. परिवार परिवेश के सरल हास्य अब बीते कल को हो चुके.
उत्साह वर्धन के लिये आप सभी का बहुत धन्यवाद
wah bhai wah!
बहुत ख़ूब ! आश्चर्य तो इस बात का है कि इतने करंट लगने के बाद भी हास्य कवि है।
wonnderfullllllllllllllllllllllllllllllllllll!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!…..