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और रखो जूते पँखे पर… August 3, 2007

Posted by pryas in हास्य.
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यह पोस्ट बडी जल्दी में लिखी है गलतीयाँ लाज़मी हैं। कृपया इंगित करें।

घर से निकलते-निकलते ही आठ बज गए थे। मनीष स्टेशन पर इंतज़ार कर रहा होगा, सोच कर एक ऑटो वाले को रोका। मगर ये ऑटो वाले तो आज कल प्रधानमंत्री हो गये हैं। उसने रूकना तो दूर बल्कि हमारी तरफ ऐसे देखा जैसे सुबह की रेल के यात्री, पटरी के दोनों तरफ बैठे लोगों को नफरत से देखते हैं। कुछेक और ऑटो वालों को रोकने की नाकाम कोशिश करने के बाद हमने गुंडो के अड्डे पर जाना ही बेहतर समझा। तेज कदमों से मैं ऑटो स्टैंड की तरफ बढा। मैंने एक से पुछा,”भैया, क्या पुरानी दिल्ली स्टेशन चलोगे”? तो पहले उन तीन-चार ड्राईवरों ने बीडी फुंकते हुए हमारा ऊपर से नीचे तक पूरा मुआयना किया। और फिर पूछा, “कहाँ जाना है”? भैया, पुरानी दिल्ली चलोगे क्या? - हम चीखते हुए बोले। पुरानी दिल्ली में कहाँ जाओगे? खीजते हुए… अरे भैया, पुरानी दिल्ली स्टेशन जाना है। हाँ-हाँ, तो ऐसे बोलो ना, सौ रूपय लगेंगे। क्यों, क्या मीटर से नहीं चलोगे? हमने डरते-डरते पूछा। और साथ ही अपने मन में जवाब भी खुद ही दे दिया। “मीटर खराब है” जोर की आवाज कानों में पडी। अच्छा ठीक है ५० रू दूंगा। नहीं भाई साहब, चलो आप ९५ दे देना। इस ना खत्म होने वाल बहस पर विराम लगाते हुए हमने कहा, “अच्छा भाई साब, ७० ले लेना” अब जल्दी चलो, ८.१५ तो यहीं हो गए ८.५० कि ट्रेन है।

ऑटो ने चलना शुरू किया तो जान में जान आई। किसी तरह ८.४५ पर स्टेशन पहुँचे। ऑटो को हमने बाहर ही रूकवा लिया और सौ का नोट निकाल कर ऑटो वाले की ओर बढाया। फिर वही रटा-रटाया जवाब - भाई साहब खुल्ले दे दो। मैंने अपना सामान उठाया और खिसकते हुए बोला-ठीक है चार-पाँच दिन के बाद लौटेंगे तब ले लेना। अच्छा साब देते हैं, ऑटो वाला घबराते हुए बोला। ३० रूपय वापस लेकर हम प्लेटफार्म की तरफ दौडे। गाडी तीन नं प्लेटफार्म पर आनी थी। स्साब कौन सी गाडी पकडनी है, हम ले चलते हैं लगेज स्साब-एक कुली बोला। अरे हटो भई नहीं चाहिए हमें कुली… तेजी से सिढीयां उतरते हुए हम बोले। एक-एक मिनट भारी लग रहा था। दिमाग में चार-पाँच सौ विचार एक साथ कौंध रहे थे। अगर गाडी छूट गयी या शायद सामान ही गिर जाए तो क्या होगा? अचानक देखा सामने हमारी ही गाडी खडी थी। चहरे पे खुशी की एसी लहर फैली जैसे दसवीं के बोर्ड की परिक्षा पास कर ली हो। पर यह क्या? ये व्यक्ति हमें देख कर खिसें क्यों निपोर रहा है? अरे…ये तो मनीष है। तब कहीं जा कर जान में जान आयी। क्यों बे नरेश इतना परेशान क्यों है? मनीष बोल। मैने कहा-गाडी छुटने वाली है और तुम नीचे खडे हो! अरे घबराओ मत गाडी २० मिनट लेट है-सुनकर हमने एक गहरी साँस छोडी। सामान नीचे रखा और अपनी हालत देखी। ऐसा लग रहा था जैसे हम ऑटो में नहीं ऑटो हमारे उपर बैठ कर आया हो।

खैर जैसे-तैसे पहुँचे तो सही। गाडी में जाकर अपनी सीट पर कब्जा किया और सीधा दरवाजे पर यात्री चार्ट देखने लगे। नहीं-नहीं अपना नाम नहीं… बल्कि यह देख रहे थे कि कोई महिला (२० से २५ वर्ष) यात्री अपने आसपास या अपने कोच में कहाँ बैठी है। पुरानी आदत है हमारी। यदि हमारी टिकीट वेटिंग भी है तो भी उसी कोच को प्राथिमकता दी जाती थी जिसमें… समझ गये ना।

करीब ९.२० पर गाडी ने सीटी देकर गार्ड को सतर्क किय और हल्के से झटके के साथ पटरी पर दौडना शुरु किया। मेरी साईड अपर बर्थ थी और मनीष की बर्थ अपर बर्थ। मनीष अपने दफ्तर के काम से हफ्ते में अक्सर २-३ बार रेल में सफर करता था। उसे अपने उपर बडा विश्वास था या फिर यूं कहो जैसे पूरी गाडी की जिम्मेवारी उसी की हो। हमारे डब्बे में कुछ लोग पिये हुए थे और वो दरवाज़े पर खडे होकर धुंआं फुंक रहे थे। धीरे-धीरे रात गहराती चली जा रही थी। मैं और मनीष दरवाज़े पर अड्डा जमा कर बैठे हुए थे। पीछे छुटते हुए पेड, घर, गाँव और कहीं-कहीं दुर सुनसान खेतों में ट्यूबवैल पर एक छोटा सा लट्टू बल्ब जलता हुआ इंसान के होने का आभास करा रहा था। बीच में कभी-कभी कोई छोटा-मोटा स्टेशन भी आ जाता लेकिन ट्रेन बिना रूके चलती जा रही थी।

टुंडला जंक्शन गुजर चुका था। आखों में नींद भर आई थी फिर भी हम दोनों दरवाज़े पर बैठे हुए थे। फिरोज़ाबाद पर कुछ देर रूकने के बाद गाडी ने सीटी दी तो मनीष ने सोने की ईक्छा ज़ाहिर की तो मैंने भी सहमती दे दी। हमने अपने जूते उतार कर नासमझों की तरह उनका सिरहाना बना लिया और उन पर अपना बैग रख कर लेट गए। मनीष ने एतराज जताया - अबे यह बि*रीयों (संबंधित बंधुओं से माफी चाहता हूँ) की तरह जूतों पर क्यों सो रहे हो। इन्हें यहाँ पँखे के उपर रखदो। हम अपने माथे पर क्यश्च्न मार्क (?) लगाते हुए कहा-वहाँ से तो कोई उठा कर ले जाएगा हम तो यहीं रखेंगे। मनीष फिर गुर्राया-नरेश धीरे बोलो। हमने कहा-धीरे। वह फिर बोला अबे - मज़ाक मत कर और जूते यहाँ रख दो। हमने अडते हुए जवाब दिया-हम नहीं रखेंगे तुम रखो। सुबह देखना जूते और सामान दोनों गायब मिलेंगे कोई भी समझ जायेगा कि पहली पर ट्रेन में सफर कर रहे हो-मनीष ने जूते पँखे पर रखते हुए अपना तजुर्बा बताया।

रात को कई बार उठ-उठ कर जूते और सामान चैक किया लेकिन वह तो गायब ही नहीं हुआ था, फिर मनीष ने क्यों कहा था? खैर पता नहीं कब नींद आ गयी और साथ-साथ सपना भी। सपना भी आया तो वह भी ट्रेन का-कोई हमें पकडकर झिंझोड रहा था। हमने सोचा शायद जूते और सामान चुराने आया है और लगा दिया कनपटी के नीचे। नरेश…. अबे ओ नरेश … की आवाज़ कानों में पडते ही नींद जाने कहाँ हवा हो गई और क्या देखते हैं कि सामने मनीष खडा अपनी कनपटी को सहला रहा था। वो फिर चीखा - अबे मारा क्यों था। हमने सोचते हुए कहा - हमने तो सपने में…ओह तो तुम्हें पड गया। हाँ हमें पड गया और हमारे जूते कहाँ हैं? हमारा हाथ झट से अपने सिरहाने गया और जूते टटोलते हुए कहा-यह रहे। अरे ये तो तुम्हारे हैं मेरे कहाँ हैं? हमने फुर्ती से पँखे की तरफ ईशारा करे दिया… वहाँ। लेकिन जूते वहाँ नहीं थे। मुझे अंदर ही अंदर हँसी आ रही थी-कभी मनीष की कल रात की बाते सोचकर और कभी उसकी शक्ल देख कर।

सुबह के कोई साढे छै बज रहे थे, ये लो मेरी स्लिपर्स पहन लो और कभी भी जूते पँखे पर मत रखना। मनीष हारे हुए प्रत्याशी की तरह जमीन की तरफ देख रहा था। अगला स्टेशन कानपुर सैट्र्ल था और हम दरवाज़े की तरफ बढ रहे थे।

Comments»

1. sanjay bengani - August 3, 2007

ही ही ही यह भी खुब रही. वैसे जूतों का सिरहाना बनाना भी कुछ बुरा नहीं. :)

2. समीर लाल - August 3, 2007

अच्छा ही हुआ जो जल्दी में लिखी. आराम से लिखते तो पूरी उपन्यास ही हो जाती. :)

-बढ़िया है.

3. Shrish - August 3, 2007

हे हे, मजेदार। आपकी टिप काम आएगी। आईँदा हम भी जूतों का स‌िरहाना बना कर स‌ोएँगे। :)

4. अनूप शुक्ल - August 3, 2007

सही है। वैसे भी कानपुर में जूते बड़े सस्ते मिलते हैं। :)

5. paramjitbali - August 3, 2007

बहुत बढिया ! पढकर मन प्रसन्ना हो गया। :(