विद्यावती - सत्रहवीं पुतली August 22, 2007
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विद्यावती नामक सत्रहवीं पुतली ने जो कथा कही वह इस प्रकार है- महाराजा विक्रमादित्य की प्रजा को कोई कमी नहीं थीं। सभी लोग संतुष्ट तथा प्रसन्न रहते थे। कभी कोई समस्या लेकर यदि कोई दरबार आता था उसकी समस्या को तत्काल हल कर दिया जाता था। प्रजा को किसी प्रकार का कष्ट देने वाले अधिकारी को दण्डित किया जाता था। इसलिए कहीं से भी किसी तरह की शिकायत नहीं सुनने को मिलती थी। राजा खुद भी वेश बदलकर समय-समय पर राज्य की स्थिति के बारे में जानने को निकलते थे। ऐसे ही एक रात जब वे वेश बदलकर अपने राज्य का भ्रमण कर रहे थे तो उन्हें एक झोंपड़े से एक बातचीत का अंश सुनाई पड़ा। कोई औरत अपने पति को राजा से साफ़-साफ़ कुछ बताने को कह रही थी और उसका पति उसे कह रहा था कि अपने स्वार्थ के लिए अपने महान राजा के प्राण वह संकट में नहीं डाल सकता है।
विक्रम समझ गए कि उनकी समस्या से उनका कुछ सम्बन्ध है। उनसे रहा नहीं गाया। अपनी प्रजा की हर समस्या को हल करना वे अपना कर्त्तव्य समझते थे। उन्होंने द्वार खटखटाया, तो एक ब्राह्मण दम्पत्ति ने दरवाजा खोला। विक्रम ने अपना परिचय देकर उनसे उनकी समस्या के बारे में पूछा तो वे थर-थर काँपने लगे। जब उन्होंने निर्भय होकर उन्हें सब कुछ स्पष्ट बताने को कहा तो ब्राह्मण ने उन्हें सारी बात बता दी। ब्राह्मण दम्पत्ति विवाह के बारह साल बाद भी निस्संतान थे।
इन बारह सालों में संतान के लिए उन्होंने काफ़ी यत्न किए। व्रत-उपवास, धर्म-कर्म, पूजा-पाठ हर तरह की चेष्टा की पर कोई फायदा नहीं हुआ। ब्राह्मणी ने एक सपना देखा है। स्वप्न में एक देवी ने आकर उसे बताया कि तीस कोस की दूरी पर पूर्व दिशा में एक घना जंगल है जहाँ कुछ साधु सन्यासी शिव की स्तुति कर रहे हैं। शिव को प्रसन्न करने के लिए हवन कुण्ड में अपने अंग काटकर डाल रहे हैं। अगर उन्हीं की तरह राजा विक्रमादित्य उस हवन कुण्ड में अपने अंग काटकर फेंकें, तो शिव प्रसन्न होकर उनसे उनकी इच्छित चीज़ माँगने को कहेंगे। वे शिव से ब्राह्मण दम्पत्ति के लिए संतान की माँग कर सकते हैं और उन्हें सन्तान प्राप्ति हो जाएगी।
विक्रम ने यह सुनकर उन्हें आश्वासन दिया कि वे यह कार्य अवश्य करेंगे। रास्त में उन्होंने बेतालों को स्मरण कर बुलाया तथा उस हवन स्थल तक पहुँचा देने को कहा। उस स्थान पर सचमुच साधु-सन्यासी हवन कर रहे थे तथा अपने अंगों को काटकर अग्नि-कुण्ड में फेंक रहे थे। विक्रम भी एक तरफ बैठ गए और उन्हीं की तरह अपने अंग काटकर अग्नि को अर्पित करने लगे। जब विक्रम सहित वे सारे जलकर राख हो गए तो एक शिवगण वहाँ पहुँचा तथा उसने सारे तपस्विओं को अमृत डालकर ज़िन्दा कर दिया, मगर भूल से विक्रम को छोड़ दिया।
सारे तपस्वी ज़िन्दा हुए तो उन्होंने राख हुए विक्रम को देखा। सभी तपस्विओं ने मिलकर शिव की स्तुति की तथा उनसे विक्रम को जीवित करने की प्रार्थना करने लगे। भगवान शिव ने तपस्विओं की प्रार्थना सुन ली तथा अमृत डालकर विक्रम को जीवित कर दिया । विक्रम ने जीवित होते ही शिव के सामने नतमस्तक होकर ब्राह्मण दम्पत्ति को संतान सुख देने के लिए प्रार्थना की। शिव उनकी परोपकार तथा त्याग की भावना से काफ़ी प्रसन्न हुए तथा उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। कुछ दिनों बाद सचमुच ब्राह्मण दम्पत्ति को पुत्र लाभ हुआ।
गाँधारी का श्राप और प्रभु श्री कृष्ण का श्राप स्वीकारना August 21, 2007
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दुर्योधन के अंत के साथ ही महाभारत के महायुद्ध का भी अंत हो गया । माता गाँधारी दुर्योधन के शव के पास खडी फफक-फफक कर रो रही हैं । पुत्र वियोग में “गाँधारी का भगवान कृष्ण को श्राप देना, भगवान कृष्ण का श्राप को स्वीकार करना और गाँधारी का पश्चताप करना” । इसका बडा ही मार्मिक वर्णन किया है धर्मवीर भारती जी ने (गीता-कविता से संकलित)
गाँधारी : ह्र्दय विदारक स्वर में
तो वह पडा है कंकाल मेरे पुत्र का
किया है यह सब कुछ कृष्ण
तुमने किया है सब
सुनो
आज तुम भी सुनो
मैं तपस्विनी गाँधारी
अपने सारे जीवन के पुण्यों का
बल ले कर कहती हूँ
कृष्ण सुनो
तुम अगर चाहते तो रूक सकता था युद्द यह
मैंने प्रसव नहीं किया था कंकाल वह
इंगित पर तुम्हारे ही भीम ने अधर्म किया
क्यों नहीं तुमने यह शाप दिया भीम को
जो तुमने दिया अश्वत्थामा को
तुमने किया है प्रभुता का दुरूपयोग
यदि मेरी सेवा में बल है
संचित तप में धर्म है
प्रभु हो या परात्पर हो
कुछ भी हो
सारा तुम्हारा वंश
इसी तरह पागल कुत्तों की तरह
एक दूसरे को परस्पर फाड खायेगा
तुम खुद उनका विनाश कर के कई वर्षों बाद
किसी घने जंगल में
साधारण व्याध के हाथों मारे जाओगे
प्रभु हो पर मारे जाओगे पशु की तरह
वंशी ध्वनि: कृष्ण की आवाज
कृष्ण ध्वनि:
प्रभु हूँ या परात्पर
पर पुत्र हूँ तुम्हारा तुम माता हो
मैंने अर्जुन से कहा
सारे तुम्हारे कर्मों का पाप पुण्य योगक्षेम
मैं वहन करूँगा अपने कंधों पर
अट्ठारह दिनों के इस भीषण संग्राम में
कोई नहीं केवल मैं ही मरा हूँ करोडों बार
जितनी बार जो भी सैनिक भूमिशायी हुआ
कोई नहीं था
मैं ही था
गिरता था जो घायल हो कर रणभूमि में
अश्वत्थामा के अंगों से
रक्त पीप स्वेद बन कर बहूँगा
मैं ही युग युगांतर तक
जीवन हूँ मैं
तो मृत्यु भी मैं ही हूँ माँ
श्राप यह तुम्हारा स्वीकार है
गाँधारी:
यह क्या किया तुमने
फूट कर रोने लगती है
कोई नहीं में अपने
सौ पुत्रों के लिये
लेकिन कृष्ण तुम पर
मेरी ममता अगाध है
कर देते श्राप मेरा तुम अस्वीकार
तो क्या मुझे दु:ख होता?
मैं थी निराश मैं कटु थी
पुत्रहीन थी
कृष्ण ध्वनी:
ऐसा मत कहो
माता
जब तक मैं जीवित हूँ
पुत्रहीन नहीं हो तुम
प्रभु हूँ या परात्पर
पर पुत्र हूँ तुम्हारा
तुम माता हो
क्रोध पर विजय August 17, 2007
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एक व्यक्ति के बारे में यह विख्यात था कि उसको कभी क्रोध आता ही नहीं है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हें सिर्फ बुरी बातें ही सूझती हैं। ऐसे ही व्यक्तियों में से एक ने निश्चय किया कि उस अक्रोधी सज्जन को पथच्युत किया जाये और वह लग गया अपने काम में। उसने इस प्रकार के लोगों की एक टोली बना ली और उस सज्जन के नौकर से कहा - “यदि तुम अपने स्वामी को उत्तेजित कर सको तो तुम्हें पुरस्कार दिया जायेगा।” नौकर तैयार हो गया। वह जानता था कि उसके स्वामी को सिकुडा हुआ बिस्तर तनिक भी अच्छा नहीं लगता है। अत: उसने उस रात बिस्तर ठीक ही नहीं किया।
प्रात: काल होने पर स्वामी ने नौकर से केवल इतना कहा - “कल बिस्तर ठीक था।”
सेवक ने बहाना बना दिया और कहा - “मैं ठीक करना भूल गया था।”
भूल तो नौकर ने की नहीं थी, अत: सुधरती कैसे? इसलिये दूसरे, तीसरे और चौथे दिन भी बिस्तर ठीक नहीं बिछा।
तब स्वामी ने नौकर से कहा - “लगता है कि तुम बिस्तर ठीक करने के काम से ऊब गये हो और चाहते हो कि मेरा यह स्वभाव छूट जाये। कोई बात नहीं। अब मुझे सिकुडे हुए बिस्तर पर सोने की आदत पडती जा रही है।”
अब तो नौकर ने ही नहीं बल्कि उन धूर्तों ने भी हार मान ली।
अल्हड बिकानेरी की सरकार बन क्यों नहीं जाने देते? - हास्य कविता - August 16, 2007
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अल्हड बिकानेरी की एक मज़ेदार कविता
जो बुढ्ढे खूसट नेता हैं, उनको खड्डे में जाने दो ।
बस एक बार, बस एक बार मुझको सरकार बनाने दो ।
मेरे भाषण के डंडे से
भागेगा भूत गरीबी का ।
मेरे वक्तव्य सुनें तो झगडा
मिटे मियां और बीवी का ।
मेरे आश्वासन के टानिक का
एक डोज़ मिल जाए अगर,
चंदगी राम को करे चित्त
पेशेंट पुरानी टी बी का ।
मरियल सी जनता को मीठे, वादों का जूस पिलाने दो,
बस एक बार, बस एक बार, मुझको सरकार बनाने दो ।
जो कत्ल किसी का कर देगा
मैं उसको बरी करा दूंगा,
हर घिसी पिटी हीरोइन कि
प्लास्टिक सर्जरी करा दूंगा;
लडके लडकी और लैक्चरार
सब फिल्मी गाने गाएंगे,
हर कालेज में सब्जैक्ट फिल्म
का कंपल्सरी करा दूंगा ।
हिस्ट्री और बीज गणित जैसे विषयों पर बैन लगाने दो,
बस एक बार, बस एक बार, मुझको सरकार बनाने दो ।
जो बिल्कुल फक्कड हैं, उनको
राशन उधार तुलवा दूंगा,
जो लोग पियक्कड हैं, उनके
घर में ठेके खुलवा दूंगा;
सरकारी अस्पताल में जिस
रोगी को मिल न सका बिस्तर,
घर उसकी नब्ज़ छूटते ही
मैं एंबुलैंस भिजवा दूंगा ।
मैं जन-सेवक हूं, मुझको भी, थोडा सा पुण्य कमाने दो,
बस एक बार, बस एक बार, मुझको सरकार बनाने दो ।
श्रोता आपस में मरें कटें
कवियों में फूट नहीं होगी,
कवि सम्मेलन में कभी, किसी
की कविता हूट नहीं होगी;
कवि के प्रत्येक शब्द पर जो
तालियाँ न खुलकर बजा सकें,
ऐसे मनहूसों को, कविता
सुनने की छूट नहीं होगी ।
कवि की हूटिंग करने वालों पर, हूटिंग टैक्स लगाने दो,
बस एक बार, बस एक बार, मुझको सरकार बनाने दो ।
ठग और मुनाफाखोरों की
घेराबंदी करवा दूंगा,
सोना तुरंत गिर जाएगा
चाँदी मंदी करवा दूंगा;
मैं पल भर में सुलझा दूंगा
परिवार नियोजन का पचडा,
शादी से पहले हर दूल्हे
की नसबंदी करवा दूंगा ।
होकर बेधडक मनाएंगे फिर हनीमून दीवाने दो,
बस एक बार, बस एक बार, मुझको सरकार बनाने दो ।
बस एक बार, बस एक बार, मुझको सरकार बनाने दो ।
वेद प्रकाश जी की एक “डबल हास्य” कविता August 10, 2007
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एक काला आदमी
बहुत ही काला
काला स्याह
सुपर काला
जैड ब्लैक
डबल अफ्रीकन
एल्डर सन ऑफ अमावस्य
औंधे तवे का ताऊ
पहाडी कौए का पडदादा
कोयल संप्रदाय का दादू
बंगाल का काला जादू
तारकोल जिसके पैरों में भक्ति भाव से पसरता हो,
कोयला जिसका रूप रंग पाने के लिये, सदियों तक जमीन के नीचे बैठ कर तपस्या करता हो
जिसदिन उस कालानुभाव के दर्शन हुए, जमीन थमी रह गयी
अब इससे ज्यादा क्या कहुँ,
इतना कहने के बाद भी, मेरे पास शब्दों की कमी रह गयी
शादी होते ही माँ-बाप को धक्के देकर बाहर निकाल देने वाली औलाद सा कपूत,
कुल मिला कर इतना काला जितनी किसी भ्रष्ट नेता की करतूत
एक दुकान पर गया
ना शर्म ना हया
बोला - फेयर एण्ड लवली है
दुकानदार ने कहा नहीं
तो कहने लगा -
फेयर-फेयर नैस जैसी कोई और क्रीम सही
दुकानदार बोला वो भी नहीं
तो बोला - कोई और
तो जब इस बार भी गर्दन दुकानदार ने इंकार में हिलाई
तो कहने लगा - Cherry Blossom ही दे दे
कम से कम चमक तो बनी रहेगी भाई
हाथी ने कुत्ते से क्या कहा? August 8, 2007
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जब भी कोई हाथी शहर में नजर आता है तो कुत्ते उस पर भौंकने लगते हैं। एक दिन हाथी ने कुत्ते को उसकी औकात दिखा दी। शायद फ़ैज़ाबादी साहब अपनी इस कविता में यही कहने की कोशिश की है।
हे मेरे गाँव के परमप्रिय कुत्ते
मुझे देख-देख कर चौंकते रहो
और जब तक दिखाई पडूं
भौंकते रहो, भौंकते रहो, मेरे दोस्त
भौंकते रहो
इसलिये कि मैं हाथी हूं
गाँव-भर का साथी हूं
बच्चे, बूढे, जवान, सभी छिडकते हैं जान
मगर तुम खडा कर रहे हो विरोध का झंडा
बेकार का वितंडा
अपना तो ऐसे-वैसों से कोई वास्ता नहीं है
‘परिश्रम के अलावा कोई रास्ता नहीं है’
इसलिये मैं हूं पूजनीय-वंदनीय
मेरा सम्मान है मर्यादा है
क्योंकि मेरी ‘दूरद्रष्टि है पक्का इरादा है’
और तुम ढुंढ रहे हो कौरा।
कौरे के लिये दौरा।
हाय रे मुफ्तखोरी पहरे के नाम पर चोरी
बिल्कुल वाहियात हो, रीते हो
आदमियों से भी गये-बीते हो
कई बार सजाएँ मिलीं तुम्हें कडी-कडी
मगर कुत्ते की पूंछ मुडी की मुडी
सुना है तुम्हारी जबान में अमृत बसता है
फिर ज़हर क्यों बो रहे हो?
मैं तो हँस रहा हूँ, तुम रो रहे हो।
भौंक-भौंक कर क्या कर पाओगे
कुत्ते की मौत मर जाओगे
अपने गाँव के प्रति वफादार बनो
अपनों से प्यार करो
तुम्हारी तरह कितने लोग
बेकार के चक्कर में चौंकते रहते हैं
हाथी चला जाता है
कुत्ते भौंकते रहते हैं।
रामधीर सिंह दिनकर जी की बाल-कविता August 7, 2007
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एक दिन चाँद ने अपनी माता से कहा कि उसे ठंड लगती है इसलिये उसके लिये एक झिंगोला सिलवा दें. लेकिन उसकी माता के सामने समस्या यह है कि चाँद का आकार घटता-बढता रहता है तो वो नाप कैसे ले…
पढिये रामधीर सिंह दिनकर जी की यह बाल-कवित आपको बिल्कुल आपके बचपन की याद दिलायेगी
हठ कर बैठा चाँद एक दिन माता से यह बोला
सिलवा दो माँ मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला
सन सन चलती हवा रात भर जाडे में मरता हूँ
ठिठुर ठिठुर कर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूँ
आसमान का सफर और यह मौसम है जाडे का
न हो अगर तो ला दो मुझको कुर्ता ही भाडे का
बच्चे की सुन बात कहा माता ने अरे सलोने
कुशल करे भगवान लगे मत तुझको जादू टोने
जाडे की तो बात ठीक है पर मै तो डरती हूँ
एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूँ
कभी एक अंगुल भर चौडा कभी एक फुट मोटा
बडा किसी दिन हो जाता है और किसी दिन छोटा
घटता बढता रोज़ किसी दिन ऐसा भी करता है
नहीं किसी की भी आँखों को दिखलाई पडता है
अब तू ही यह बता नाप तेरा किस रोज़ लिवायें?
सी दें एक झिंगोला जो हर रोज़ बदन में आयें?
जैमिनी हरियाणवी की एक हास्य कविता August 6, 2007
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एक दिन
एक पडोस का छोरा
मेरे तैं आके बोल्या
‘चाचा जी अपनी इस्त्री दे देयो’
मैं चुप्प
वो फेर कहण लागा:
‘चाचा जी अपनी इस्त्री दे देयो ना?’
जब उसने यह कही दुबारा
मैंने अपनी बीरबानी की तरफ करयौ इशारा:
‘ले जा भाई यो बैठ्यी’
छोरा कुछ शरमाया, कुछ मुस्काया
फिर कहण लागा:
‘नहीं चाचा जी, वो कपडा वाली’
मैं बोल्या,
‘तैन्नै दिखे कोन्या
या कपडा में ही तो बैठी सै’
वो छोर फिर कहण लगा
‘चाचा जी, तम तो मजाक करो सो
मननै तो वो करंट वाली चाहिये’
मैं बोल्या,
‘अरी बावली औलाद,
तू हाथ लगा के देख
या करैंट भी मारयै सै’
सत्यवती - सोलहवीं पुतली August 6, 2007
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सोलहवीं पुतली सत्यवती ने जो कथा कही वह इस प्रकार है- राजा विक्रमादित्य के शासन काल में उज्जैन नगरी का यश चारों ओर फैला हुआ था। एक से बढ़कर एक विद्वान उनके दरबार की शोभा बढ़ाते थे और उनकी नौ जानकारों की एक समिति थी जो हर विषय पर राजा को परामर्श देते थे, तथा राजा उनके परामर्श के अनुसार ही राज-काज सम्बन्धी निर्णय लिया करते थे। एक बार ऐश्वर्य पर बहस छिड़ी, तो मृत्युलोक की भी बात चली। राजा को जब पता चला कि पाताल लोक के राजा शेषनाग का ऐश्वर्य देखने लायक है और उनके लोक में हर तरह की सुख-सुविधाएँ मौजूद है। चूँकि वे भगवान विष्णु के खास सेवकों में से एक हैं, इसलिए उनका स्थान देवताओं के समकक्ष है। उनके दर्शन से मनुष्य का जीवन धन्य हो जाता है।
विक्रमादित्य ने सशरीर पाताल लोक जाकर उनसे भेंट करने की ठान ली। उन्होंने दोनों बेतालो का स्मरण किया। जब वे उपस्थित हुए, तो उन्होंने उनसे पाताल लोक ले चलने को कहा। बेताल उन्हें जब पाताल लोक लाए, तो उन्होंने पाताल लोक के बारे में दी गई सारी जानकारी सही पाई। सारा लोक साफ-सुथरा तथा सुनियोजित था। हीरे-जवाहरात से पूरा लोक जगमगा रहा था। जब शेषनाग को ख़बर मिली कि मृत्युलोक से कोई सशरीर आया है तो वे उनसे मिले। राजा विक्रमादित्य ने पूरे आदर तथा नम्रता से उन्हें अपने आने का प्रयोजन बताया तथा अपना परिचय दिया। उनके व्यवहार से शेषनाग इतने प्रसन्न हो गए कि उन्होंने चलते वक्त उन्हें चार चमत्कारी रत्न उपहार में दिए। पहले रत्न से मुँहमाँगा धन प्राप्त किया जा सकता था।
दूसरा रत्न माँगने पर हर तरह के वस्र तथा आभूषण दे सकता था। तीसरे रत्न से हर तरह के रथ, अश्व तथा पालकी की प्राप्ति हो सकती थी। चौथा रत्न धर्म-कार्य तथा यश की प्राप्ति करना सकता था। काली द्वारा प्रदत्त दोनों बेताल स्मरण करने पर उपस्थित हुए तथा विक्रम को उनके नगर की सीमा पर पहुँचा कर अदृश्य हो गए। चारों रत्न लेकर अपने नगर में प्रविष्ट हुए ही थे कि उनका अभिवादन एक परिचित ब्राह्मण ने किया। उन्होंने राजा से उनकी पाताल लोक की यात्रा तथा रत्न प्राप्त करने की बात जानकर कहा कि राजा की हर उपलब्धि में उनकी प्रजा की सहभागिता है। राजा विक्रमादित्य ने उसका अभिप्राय समझकर उससे अपनी इच्छा से एक रत्न ले लेने को कहा। ब्राह्मण असमंजस में पड़ गया और बोला कि अपने परिवार के हर सदस्य से विमर्श करने के बाद ही कोई फैसला करेगा। जब वह घर पहुँचा और अपनी पत्नी बेटे तथा बेटी से सारी बात बताई, तो तीनों ने तीन अलग तरह के रत्नों में अपनी रुचि जताई। ब्राह्मण फिर भी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सका और इसी मानसिक दशा में राजा के पास पहुँच गया। विक्रम ने हँसकर उसे चारों के चारों रत्न उपहार में दिए।
और रखो जूते पँखे पर… August 3, 2007
Posted by pryas in हास्य.5 comments
यह पोस्ट बडी जल्दी में लिखी है गलतीयाँ लाज़मी हैं। कृपया इंगित करें।
घर से निकलते-निकलते ही आठ बज गए थे। मनीष स्टेशन पर इंतज़ार कर रहा होगा, सोच कर एक ऑटो वाले को रोका। मगर ये ऑटो वाले तो आज कल प्रधानमंत्री हो गये हैं। उसने रूकना तो दूर बल्कि हमारी तरफ ऐसे देखा जैसे सुबह की रेल के यात्री, पटरी के दोनों तरफ बैठे लोगों को नफरत से देखते हैं। कुछेक और ऑटो वालों को रोकने की नाकाम कोशिश करने के बाद हमने गुंडो के अड्डे पर जाना ही बेहतर समझा। तेज कदमों से मैं ऑटो स्टैंड की तरफ बढा। मैंने एक से पुछा,”भैया, क्या पुरानी दिल्ली स्टेशन चलोगे”? तो पहले उन तीन-चार ड्राईवरों ने बीडी फुंकते हुए हमारा ऊपर से नीचे तक पूरा मुआयना किया। और फिर पूछा, “कहाँ जाना है”? भैया, पुरानी दिल्ली चलोगे क्या? - हम चीखते हुए बोले। पुरानी दिल्ली में कहाँ जाओगे? खीजते हुए… अरे भैया, पुरानी दिल्ली स्टेशन जाना है। हाँ-हाँ, तो ऐसे बोलो ना, सौ रूपय लगेंगे। क्यों, क्या मीटर से नहीं चलोगे? हमने डरते-डरते पूछा। और साथ ही अपने मन में जवाब भी खुद ही दे दिया। “मीटर खराब है” जोर की आवाज कानों में पडी। अच्छा ठीक है ५० रू दूंगा। नहीं भाई साहब, चलो आप ९५ दे देना। इस ना खत्म होने वाल बहस पर विराम लगाते हुए हमने कहा, “अच्छा भाई साब, ७० ले लेना” अब जल्दी चलो, ८.१५ तो यहीं हो गए ८.५० कि ट्रेन है।
ऑटो ने चलना शुरू किया तो जान में जान आई। किसी तरह ८.४५ पर स्टेशन पहुँचे। ऑटो को हमने बाहर ही रूकवा लिया और सौ का नोट निकाल कर ऑटो वाले की ओर बढाया। फिर वही रटा-रटाया जवाब - भाई साहब खुल्ले दे दो। मैंने अपना सामान उठाया और खिसकते हुए बोला-ठीक है चार-पाँच दिन के बाद लौटेंगे तब ले लेना। अच्छा साब देते हैं, ऑटो वाला घबराते हुए बोला। ३० रूपय वापस लेकर हम प्लेटफार्म की तरफ दौडे। गाडी तीन नं प्लेटफार्म पर आनी थी। स्साब कौन सी गाडी पकडनी है, हम ले चलते हैं लगेज स्साब-एक कुली बोला। अरे हटो भई नहीं चाहिए हमें कुली… तेजी से सिढीयां उतरते हुए हम बोले। एक-एक मिनट भारी लग रहा था। दिमाग में चार-पाँच सौ विचार एक साथ कौंध रहे थे। अगर गाडी छूट गयी या शायद सामान ही गिर जाए तो क्या होगा? अचानक देखा सामने हमारी ही गाडी खडी थी। चहरे पे खुशी की एसी लहर फैली जैसे दसवीं के बोर्ड की परिक्षा पास कर ली हो। पर यह क्या? ये व्यक्ति हमें देख कर खिसें क्यों निपोर रहा है? अरे…ये तो मनीष है। तब कहीं जा कर जान में जान आयी। क्यों बे नरेश इतना परेशान क्यों है? मनीष बोल। मैने कहा-गाडी छुटने वाली है और तुम नीचे खडे हो! अरे घबराओ मत गाडी २० मिनट लेट है-सुनकर हमने एक गहरी साँस छोडी। सामान नीचे रखा और अपनी हालत देखी। ऐसा लग रहा था जैसे हम ऑटो में नहीं ऑटो हमारे उपर बैठ कर आया हो।
खैर जैसे-तैसे पहुँचे तो सही। गाडी में जाकर अपनी सीट पर कब्जा किया और सीधा दरवाजे पर यात्री चार्ट देखने लगे। नहीं-नहीं अपना नाम नहीं… बल्कि यह देख रहे थे कि कोई महिला (२० से २५ वर्ष) यात्री अपने आसपास या अपने कोच में कहाँ बैठी है। पुरानी आदत है हमारी। यदि हमारी टिकीट वेटिंग भी है तो भी उसी कोच को प्राथिमकता दी जाती थी जिसमें… समझ गये ना।
करीब ९.२० पर गाडी ने सीटी देकर गार्ड को सतर्क किय और हल्के से झटके के साथ पटरी पर दौडना शुरु किया। मेरी साईड अपर बर्थ थी और मनीष की बर्थ अपर बर्थ। मनीष अपने दफ्तर के काम से हफ्ते में अक्सर २-३ बार रेल में सफर करता था। उसे अपने उपर बडा विश्वास था या फिर यूं कहो जैसे पूरी गाडी की जिम्मेवारी उसी की हो। हमारे डब्बे में कुछ लोग पिये हुए थे और वो दरवाज़े पर खडे होकर धुंआं फुंक रहे थे। धीरे-धीरे रात गहराती चली जा रही थी। मैं और मनीष दरवाज़े पर अड्डा जमा कर बैठे हुए थे। पीछे छुटते हुए पेड, घर, गाँव और कहीं-कहीं दुर सुनसान खेतों में ट्यूबवैल पर एक छोटा सा लट्टू बल्ब जलता हुआ इंसान के होने का आभास करा रहा था। बीच में कभी-कभी कोई छोटा-मोटा स्टेशन भी आ जाता लेकिन ट्रेन बिना रूके चलती जा रही थी।
टुंडला जंक्शन गुजर चुका था। आखों में नींद भर आई थी फिर भी हम दोनों दरवाज़े पर बैठे हुए थे। फिरोज़ाबाद पर कुछ देर रूकने के बाद गाडी ने सीटी दी तो मनीष ने सोने की ईक्छा ज़ाहिर की तो मैंने भी सहमती दे दी। हमने अपने जूते उतार कर नासमझों की तरह उनका सिरहाना बना लिया और उन पर अपना बैग रख कर लेट गए। मनीष ने एतराज जताया - अबे यह बि*रीयों (संबंधित बंधुओं से माफी चाहता हूँ) की तरह जूतों पर क्यों सो रहे हो। इन्हें यहाँ पँखे के उपर रखदो। हम अपने माथे पर क्यश्च्न मार्क (?) लगाते हुए कहा-वहाँ से तो कोई उठा कर ले जाएगा हम तो यहीं रखेंगे। मनीष फिर गुर्राया-नरेश धीरे बोलो। हमने कहा-धीरे। वह फिर बोला अबे - मज़ाक मत कर और जूते यहाँ रख दो। हमने अडते हुए जवाब दिया-हम नहीं रखेंगे तुम रखो। सुबह देखना जूते और सामान दोनों गायब मिलेंगे कोई भी समझ जायेगा कि पहली पर ट्रेन में सफर कर रहे हो-मनीष ने जूते पँखे पर रखते हुए अपना तजुर्बा बताया।
रात को कई बार उठ-उठ कर जूते और सामान चैक किया लेकिन वह तो गायब ही नहीं हुआ था, फिर मनीष ने क्यों कहा था? खैर पता नहीं कब नींद आ गयी और साथ-साथ सपना भी। सपना भी आया तो वह भी ट्रेन का-कोई हमें पकडकर झिंझोड रहा था। हमने सोचा शायद जूते और सामान चुराने आया है और लगा दिया कनपटी के नीचे। नरेश…. अबे ओ नरेश … की आवाज़ कानों में पडते ही नींद जाने कहाँ हवा हो गई और क्या देखते हैं कि सामने मनीष खडा अपनी कनपटी को सहला रहा था। वो फिर चीखा - अबे मारा क्यों था। हमने सोचते हुए कहा - हमने तो सपने में…ओह तो तुम्हें पड गया। हाँ हमें पड गया और हमारे जूते कहाँ हैं? हमारा हाथ झट से अपने सिरहाने गया और जूते टटोलते हुए कहा-यह रहे। अरे ये तो तुम्हारे हैं मेरे कहाँ हैं? हमने फुर्ती से पँखे की तरफ ईशारा करे दिया… वहाँ। लेकिन जूते वहाँ नहीं थे। मुझे अंदर ही अंदर हँसी आ रही थी-कभी मनीष की कल रात की बाते सोचकर और कभी उसकी शक्ल देख कर।
सुबह के कोई साढे छै बज रहे थे, ये लो मेरी स्लिपर्स पहन लो और कभी भी जूते पँखे पर मत रखना। मनीष हारे हुए प्रत्याशी की तरह जमीन की तरफ देख रहा था। अगला स्टेशन कानपुर सैट्र्ल था और हम दरवाज़े की तरफ बढ रहे थे।









