नारद जी पर ज़रा सोचिए… May 8, 2007
Posted by pryas in हितोपदेश.trackback
प्रसंग-१
एक बार नारद जी घुमते हुए डाकू रत्नाकर के इलाके में पहुँचे। रत्नाकर ने उन्हें लूटने के लिये रोका। नारद जी बोले “भैया मेरे पास तो यह वीणा है, इसे ही रख लो। लेकिन एक बात तो बताओ, तुम यह पाप क्यों कर रहे हो?” रत्नाकर ने कहा,”अपने परिवार के लिये।” तब नारद जी बोले, “अच्छा, लेकिन लूटने से पहल एक सवाल जरा अपने परिवार वालों से पूछ आओ कि क्या वह भी तुम्हारे पापों में हिस्सेदार हैं?”
रत्नाकर दौडे-दौडे घर पहुँचे। जवाब मिला, “हमारी देखभाल तो आपका कर्तव्य है, लेकिन हम आपके पापों में भागीदार नहीं हैं। लुटे-पिटे से रत्नाकर लौट कर नारद जी के पास आए और डाकू रत्नाकर से वाल्मीकि हो गए। बाद में उन्हें रामायण लिखने की प्रेरणा भी नारद जी से ही मिली।
प्रसंग-२
सरस्वती नदी के किनारे अपने आश्रम में व्यास उदासी में इधर-उधर घुम रहे थे। आश्रम में जब उदासी नहीं मिटी, तो वह नदी की ओर चल दिए। लेकिन बेचैनी तो खत्म ही नहीं हो रही थी। जब उन्हें कुछ भी नहीं सूझ रहा था, तो देवर्षि नारद चले आए। देवर्षि ने उनके माथे पर चिंता की रेखाएं देख पूछा, ‘आप तो महाज्ञानी हैं। महाभारत जैसी महान रचना करने के बाद भी आप खुश नहीं दिख रहे?’
उदास-परेशा व्यास ने कहा,’ज्ञान की गहराई में डूब जाने के बाद भी न जाने उदास क्यों हूं मैं? आप तो सब जानते हैं। मेरी इस उदासी की वजह बताइए?’
मुस्कराते हुए नारद जी बोले,’व्यासजी, आपने ज्ञान की अतल गहराइयों में डुबकी लगाई है। लेकिन मन की डुबकी कभी नहीं लगाई। यह उदासी उसी वजह से है।’
व्यास जी ने पूछा,’तो मैं क्या करूं देवर्षि?’ नारदजी ने जवाब दिया,’तुम प्रभु का गान क्यों नहीं करते?’
नारद जी ‘नारयण-नारयण’ करते हुए चले गए। इसी घटना के बाद व्यास जी ने भागवत की रचना की।
प्रसंग-३
अपने राजमहल में दक्ष तिलमिला रहे हैं। वह नारद को रह-रह कर कोस रहे हैं। तभी नारद जी अपनी वीणा बजाते “नारयण नारयण” कहते आ जाते हैं। नारद जी को देखते ही वह भडक जाते हैं। ‘हे नारद तुमने मेरे सारे बेटों को बहका दिया। तुमने उन्हें राजमहल छुडा कर ब्रह्मचारी बना दिया।’ नारद जी बोले,’मैंने तुम्हारे आवार बेटों को परम सच की ओर मोड दिया है। तुम भी बेटों की राह पर चले जाओ?’ गुस्से से भभकते हुए दक्ष सीधे शाप देने पर उतर आए। ‘हे नारद, तुमने मेरे बेटों को भटकाया है, तुम आजीवन भटकते रहो।’ नारद जी कोई विरोध नहीं करते। वह चुपचाप एक हताश पिता का शाप स्वीकार कर जीवन भर भटकने के लिये चल पडते हैं।
ऐसे थे नारद जी, किंतु हम लोग नारद जी का नाम लेते ही हँसना शुरु कर देते हैं। ३ मई को नारद जी की जयंती थी। क्या आप भी उन्हें विदुषक समझते हैं? जरा सोचिए तो नारद जी के बारे में…
साभार-हिन्दुस्तान दैनिक










अति उत्तम..
भक्त शिरोमणि.. नारद भक्ति सूत्र के रचयिता.. नारद के सुन्दर स्वरूप का परिचय कराने के लिये धन्यवाद…
“चोर को कहते हैं लाग” और “साहूकार को कहते हैं जाग” — यह भी उनकी ड्यूटी का एक अंग है।
नारदमुनि के व्यक्तित्व के इस अलग, सुंदर पक्ष को दिखाने क बहुत धन्य्वाद,,
नारदमुनि की विदूषक और कुटिल इमेज हिन्दी फिल्मों ने बनाई है। श्रीहरि के परमभक्त और परमज्ञानी नारद के महान व्यक्तित्व का आम व्यक्ति को अंदाजा नहीं।
नमः नारायण, नमः नारद !
नारद जी के बारे में बताने के लिए धन्यवाद ।
घुघूती बासूती