- माँ की परिभाषा - April 16, 2007
Posted by pryas in Uncategorized.trackback
बेसन की सौंधी रोटी पर, खट्टी चटनी जैसी माँ।
याद आती है चौका बर्तन, चिमटा फुंकनी जैसी माँ।।
बाँस की खुर्री खाट के उपर, हर आहट पर कान धरे।
आधी सोई आधी जागी, थकी दोपहरी जैसी माँ।।
चिडीयों की चहकार में गूंजे, राधा मोहन अली-अली।
मुर्गे की आवाज़ से खुलती, घर की कुंडी जैसी माँ।।
बिवी, बेटी, बहन, पडोसन, थोडी-थोडी सी सब में।
दिन भर इक रस्सी के उपर, चलती नटनी जैसी माँ।।
बाँट के अपना चेहरा माथा, आँखें जाने कहाँ गयीं।
फटे पुराने इक एलबम में, चंचल लडकी जैसी माँ।।
-निदा फाज़ली-










meri pasandeeda rachna hai.jaankar khushi huyi ki ye aapki bhi pasand hai
इस सुंदर रचना को पेश करने का धन्यवाद.
मनीष जी व समीर जी,
य़ह रचना आपको पंसद आयी
आपका धन्यवाद
हृदयस्पर्शी रचना।
प्यारी सी रचना .. अहा.. सुंदर रचना पढ़ाने के लिए आपका धन्यवाद प्रयास.
”आधी सोई आधी जागी, थकी दोपहरी जैसी माँ।।”
धन्यवाद राजीव जी, नीरज जी
मेरे गज़ल संग्रह ‘चीखता है मन ‘( 2001) से एक इसी शीर्षक की रचना के अंश प्रस्तुत हैँ:
अपने आगोशोँ मेँ लेकर मीठी नीँद सुलाती माँ
गर्मी हो तो ठंडक देती ,जाडोँ मेँ गर्माती माँ
जब बच्चे चीखेँ चिल्लायेँ एक खिलोना दे देती
बच्चोँ की किल्कारी सुनकर फूली नहीँ समाती माँ
हम जागेँ तो हमेँ देखकर अपनी नीँद भूल जाती
घंटोँ ,पहरोँ जाग जाग कर लोरी हमेँ सुनाती माँ
पहले चलना घुटनोँ घुट्नोँ और खदे हो जाना फिर
बच्चे जब ऊंचाई छूते बच्चोँ पर इठ्लाती माँ