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- माँ की परिभाषा - April 16, 2007

Posted by pryas in Uncategorized.
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बेसन की सौंधी रोटी पर, खट्टी चटनी जैसी माँ।
याद आती है चौका बर्तन, चिमटा फुंकनी जैसी माँ।।

बाँस की खुर्री खाट के उपर, हर आहट पर कान धरे।
आधी सोई आधी जागी, थकी दोपहरी जैसी माँ।।

चिडीयों की चहकार में गूंजे, राधा मोहन अली-अली।
मुर्गे की आवाज़ से खुलती, घर की कुंडी जैसी माँ।।

बिवी, बेटी, बहन, पडोसन, थोडी-थोडी सी सब में।
दिन भर इक रस्सी के उपर, चलती नटनी जैसी माँ।।

बाँट के अपना चेहरा माथा, आँखें जाने कहाँ गयीं।
फटे पुराने इक एलबम में, चंचल लडकी जैसी माँ।।

-निदा फाज़ली-

Comments»

1. Manish - April 16, 2007

meri pasandeeda rachna hai.jaankar khushi huyi ki ye aapki bhi pasand hai

2. समीर लाल - April 16, 2007

इस सुंदर रचना को पेश करने का धन्यवाद.

3. नरेश - April 17, 2007

मनीष जी व समीर जी,
य़ह रचना आपको पंसद आयी
आपका धन्यवाद

4. राजीव - April 18, 2007

हृदयस्पर्शी रचना।

5. नीरज दीवान - April 18, 2007

प्यारी सी रचना .. अहा.. सुंदर रचना पढ़ाने के लिए आपका धन्यवाद प्रयास.
”आधी सोई आधी जागी, थकी दोपहरी जैसी माँ।।”

6. pryas - April 18, 2007

धन्यवाद राजीव जी, नीरज जी

7. अरविन्द चतुर्वेदी - April 22, 2007

मेरे गज़ल संग्रह ‘चीखता है मन ‘( 2001) से एक इसी शीर्षक की रचना के अंश प्रस्तुत हैँ:

अपने आगोशोँ मेँ लेकर मीठी नीँद सुलाती माँ
गर्मी हो तो ठंडक देती ,जाडोँ मेँ गर्माती माँ

जब बच्चे चीखेँ चिल्लायेँ एक खिलोना दे देती
बच्चोँ की किल्कारी सुनकर फूली नहीँ समाती माँ

हम जागेँ तो हमेँ देखकर अपनी नीँद भूल जाती
घंटोँ ,पहरोँ जाग जाग कर लोरी हमेँ सुनाती माँ

पहले चलना घुटनोँ घुट्नोँ और खदे हो जाना फिर
बच्चे जब ऊंचाई छूते बच्चोँ पर इठ्लाती माँ