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कन्जूस बनिया - केवल हँसना चाहें तो पढें April 9, 2007

Posted by pryas in Uncategorized.
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एक गाँव में एक बनिया रहता था। वो बनिया बहुत कन्जूस था। खाना खाने के समय अक्सर वो सैर पर निकलता था और रास्ते में जिस घर में उसे कोई खाना खाता हुआ दिखता बस उसी के घर घुस जाता और खाना खाने बैठ जाता। गाँव वाले उसकी इस आदत से बहुत परेशान थे पर कुछ कर नहीं पाते थे क्योंकि वो उसकी दुकान से उधार सामान लेते थे। इस सब से बनिया बडा खुश था दुकान भी चल रही थी और खाने के पैसे भी बच रहे थे।

एक बार उस बनिये के घर उसका कोई दूर का रिश्तेदार तोताराम आया। अब गाँव वाले मन ही मन बडे खुश थे कि आज बनिया बुरा फंसा। लेकिन बनिया था बडा तेज। कुछ देर तोताराम से यहाँ-वहाँ की बातें करने के बाद बनिया बोला, चलो तोताराम हम तुम्हें अपने गाँव के मिठे मिठे अमरूद खिलाएं। “अमरूद अरे वाह”, तोताराम बोला। अब दोनों सुक्खन माली के बाग की तरफ चल पडे।

सुक्खन चाचा अरे ओ सुक्खन चाचा बनिये ने दुर से ही आवाज़ दी। देखो हमारे यहाँ मेहमान आए हैं इन्हें कुछ ताज़े और मिठे अमरूद खिलाओ। माली बोला हाँ हाँ क्यों नहीं ये लो एकदम ताज़े और मीठे हैं। मीठे क्या हैं पेडे हैं पेडे!! बनिया बोला, “क्या कहा पेडे हैं”? तो इसका मतलब क्या पेडे अमरूद से भी बढिया होते हैं। हाँ जी होते तो हैं माली ने कहा। तो फिर हम इन्हें पेडे ही खिलाएंगे। सुनकर तोतेराम के मुहँ में पानी आ गया।

अब बनिया चल दिया मोटेराम हलवाई की दुकान पर और बोला मोटेराम जी, ये हमारे मेहमान हैं इन्हें ताज़े पेडे खिलाओ। हाँ जी ये लो एकदम ताज़े पेडे हैं। अजी, पेडे क्या हैं मक्खन हैं मक्खन! यह सुनते ही बनिया फिर बोला, “क्या कहा मक्खन”? तो इसका मतलब क्या मक्खन पेडों से भी बढिया होते हैं। हाँ जी मक्खन होता तो बढीया है। तो फिर हम इन्हें मक्खन खिलाएंगे। सुनकर तोतेराम के मुहँ एक बार फिर उतर गया।

अब बनिया चला हरिया ग्वाले के घर। इधर तोताराम का भूख के मारे बुरा हाल हो रहा था और उधर बनिया मन ही मन बहुत खुश हो रहा था। उसके पैसे जो बच रहे थे।

हरिया अरे ओ हरिया, जरा हमारे तोताराम जी को मक्खन खिलाओ। और हाँ देखो मक्खन जरा ताज़ा लाना, बाहर से ही बनिया चिल्लाया। “अभी लाया हुज़ुर”, हरिया ने हुक्म बजाया। ये लिजिए, ये रहा मक्खन। मक्खन ताज़ा है न हरिया - बनिया मुस्कुराते हुए बोला। अजी साहब बिल्कुल ताज़ा है मेरा मेक्खन्, एकदम पानी कि तरह। सुनते ही बनिया बोला - क्या कहा? पानी है! हाँ जी एकदम पानी है, हरिया ने घबराते हुए जवाब दिया। तो फिर हम तोताराम को पानी ही पिलायेंगे। और अब तो तोतेराम की शक्ल देखनेवाली थी। खैर अब बनिया चला बाबा गुदना की प्याउ पर।

पयाउ पर पहुँच कर बनिया बोला -  बाबा ओ बाबा - जरा हमारे मेहमान को थोडा पानी पिला दो। और हाँ पानी ताज़ा पिलाना। हाँ-हाँ बेटा मेरा पानी एकदम ताज़ा है ताज़ा। और बेटा पानी क्या है हवा है हवा। क्या कहा - बनिया बोला, तुम्हारा पानी हवा है। हाँ साहब मेरा पानी हवा है जितना भी पियो पेट ही नहीं भरता। तब तो हम अपने मेहमान को हवा ही खिलाएंगे। चलो तोताराम हम तुम्हें हवा खिलाएंगे।

बस-बस बहुत हुआ, अब मुझे कुछ नहीं खाना, भूख के मारे मेरा दम निकला जा रहा है। ये कहता हुआ तोताराम वहाँ से खिसक लिया। और बनिया मन ही मन बहुत खुश हुआ।

Comments»

1. प्रियंकर - April 9, 2007

धन्य है वणिक महाराज की मेहमाननवाज़ी . भगवान तोताराम जी को भोजन नसीब कराए .

2. कमल शर्मा - April 9, 2007

धन्‍य हैं ऐसे बनिये और कंजूस। एक बार एक बनिया मर गया और जब चित्रगुप्‍त के दरबार में उसे ले जाया गया तो, भगवान चित्रगुप्‍त ने कहा कि देखों तुम्‍हारा इतना तो पुण्‍य है और इतना पाप। बताओं पहले स्‍वर्ग जाना चाहते हो या नर्क। बनिया भगवान के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और बोला हे भगवन न तो मैं पुण्‍य को जानता हूं और न पाप को। न मैं स्‍वर्ग जानता हूं और न नर्क। मुझे तो ऐसी जगह भेज दो जहां दो रुपए कमा सकूं। तो ऐसे होते हैं बनिये।

3. SHUAIB - April 9, 2007

कहानी मे एक अच्छा सबक़ है।

4. संजय बेंगाणी - April 9, 2007

हा हा हा
बहुत खुब.

5. समीर लाल - April 9, 2007

हा हा, बहुत बढ़िया, सही हवा खिलवाये सबको.. :)

6. Raj Kumar Vashisht - April 10, 2007

yeh Kahani umda hai, Hasyerus se bharpoor, ek achha vayeng bhi hai. Main dua karta hoon ki aap Bhavishya main bhi is parkar ki rachnaye post karte rahe.
Aapka Niyamit Padak

7. pryas - April 10, 2007

आप सभी बंधुओं ने अपना कीमती समय देकर जो मेरा उत्साह बढाया उसके लिये आप सभी का धन्यवाद।

प्रयास

8. ashvini jain - April 10, 2007

per kya sabhi baniye aise he honte hain?

9. pryas - April 10, 2007

अश्वनी जी,

जरा शिर्षक को देखें, कन्जूस बनिया - केवल हँसना चाहें तो पढें
केवल पढीये, हँसिए और भूल जाईये।

प्रयास

10. हरिराम - April 10, 2007

अजी! अब हवा भी मुफ्त नहीं मिलेगी। जैसे आजकल एक बोतल पानी 12 रुपये में मिलता है। बच्चों तक को स्कूल में पानी की बोतल लेकर जाना पड़ता है। बढ़ते जा रहे वायु-प्रदूषण के मद्देनजर लगता है कि अब अंतरिक्ष यात्रियों या गोताखोरों की तरह हमें भी ऑक्सीजन सीलैण्डर लादे घूमना पड़ेगा। देखें यहाँ.