एक भिखारी November 30, 2006
Posted by pryas in Uncategorized.trackback
वह एक बैंकर का बंग्ला था| सुबह के पाँच बजे किसी ने दरवाज़ा खटखटाया| एक भिखारी खडा था| बैंकर को गुस्सा आया| बेवक़्त उठा दिया| वह तमतमाता हुआ बाहार आया, हालांकि उसे दान देने में कोई दिक्कत नहिं होती थी| बाहर आकर बोला, ये भी कोई वक़्त है? भिखारी बोला, आप बैंकिंग का धन्धा करते हैं, मैंने कोई सलाह दी क्या? यह हमारा धन्धा है| आप हमें क्यों सलाह देते हैं?
बैंकर ने लाईट जलाई| वह देखना चाहता था कि आखिर सामने कौन है| यह अन्दाज़ तो किसी बादशाह का होता है, भिखमंगे का नहीं| वह एक साधारण व्यक़्ती था और वहाँ भिख माँगने ही आया था, लेकिन बैंकर ने महसूस किया की कोई आदमी अपने हेय जीवन की भी इतनी इज़्ज़्त कर सकता है|
संकलन - रमेश जैन (नवभारत टाइम्स में प्राकाशित)










Comments»
No comments yet — be the first.