एक भिखारी November 30, 2006
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वह एक बैंकर का बंग्ला था| सुबह के पाँच बजे किसी ने दरवाज़ा खटखटाया| एक भिखारी खडा था| बैंकर को गुस्सा आया| बेवक़्त उठा दिया| वह तमतमाता हुआ बाहार आया, हालांकि उसे दान देने में कोई दिक्कत नहिं होती थी| बाहर आकर बोला, ये भी कोई वक़्त है? भिखारी बोला, आप बैंकिंग का धन्धा करते हैं, मैंने कोई सलाह दी क्या? यह हमारा धन्धा है| आप हमें क्यों सलाह देते हैं?
बैंकर ने लाईट जलाई| वह देखना चाहता था कि आखिर सामने कौन है| यह अन्दाज़ तो किसी बादशाह का होता है, भिखमंगे का नहीं| वह एक साधारण व्यक़्ती था और वहाँ भिख माँगने ही आया था, लेकिन बैंकर ने महसूस किया की कोई आदमी अपने हेय जीवन की भी इतनी इज़्ज़्त कर सकता है|
संकलन - रमेश जैन (नवभारत टाइम्स में प्राकाशित)
वालिद की वफात पर - निदा फाज़ली - November 22, 2006
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तुम्हारी कब्र पर
मैं फातिहा पढने नहीं आया
मुझे मालूम था
तुम मर नहीं सकते
तुम्हारी मौत की सच्ची खबर जिसन उडाई थी
वो झूठा था
वो तुम कब थे
कोइ सूखा हुआ पत्ता हवा से हिल के टूटा था
मेरी आँखें
तुम्हारे मंजरों में क़ैद हैं अब तक
मैं जो भी देखता हुँ
सोचत हुँ
वो….. वही है
जो तुम्हारी नेकनामी और बदनामी की दुनियाँ थी
कहीं कुछ भी नहीं बदला
तुम्हारे हाथ
मेरी उँगलियों में सांस लेते हैं
मैं लिखने के लिए
जब भी कलम कागज़ उठाता हुँ
तुम्हें बैठा हुआ मैं अपनी ही कुर्सी में पाता हुँ
बदन में मेरे जितना भी लहू है
वो तुम्हारी
लग्ज़िशों नाकामियों के साथ बहता है
मेरी आवाज़ में छुप कर
तुम्हारा जहन रहता है
मेरी बिमारियों में तुम
मेरी लाचारीयों में तुम
तुम्हरी कब्र पर जिसने तुम्हारा नाम लिक्खा है
वो झूठा है
तुम्हारी कब्र में मैं दफ्न हूँ
तुम मुझ में ज़िन्दा हो
कभी फुर्सत मिले तो फातिहा पढने चले आना
- निदा फाज़ली -
एक बेटी का सवाल ……घर कौन सा है मेरा? November 9, 2006
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चौराहे पर खङी है, सामान बांधे अपना
कोइ मुझे बता दे, कौन सा घर है मेरा
पहला वो घर था, जिस में जनम लिया था
बाबा ने उंगली पकङी, मैंने कदम लिया था|
युं लम्हा-लम्हा पाला, खूने जिगर पिलाया
मेहनत से रोज़ो-शुब की, इतना मुझे पढाया
कह्ती थी मेरी अम्मी, तुम तो पराया धन हो
हो गैर की अमानत, मेहमान जाने मन हो|
तुम गैर की अपनी होगी, तो सांस सुख का लुंगी
सोऊंगी नींद अपनी, बेफिक्र भी रहुउंगी
बाबा ने रुख्सति पर, मुझ से कहा था बेटा!
गर हो खुशी से आना, तो दर ये खुला है|
वर्ना तुम्हारा घर तो, शौहर का घर है बेटा!
उस घर में जा बसोगी, तो मुझ को सुकुं मिलेगा
खुशियां बहुत समेटो, फूलो फलो वहीं पर
तुम चाहे तख्त नशिं हो, या बैठो ज़मिं पर|
उस घर की प्यरी मिट्टी, तुम्हारा श्रंगार होगी
ये प्यरा सा तस्सुवर, दिल में बसा के लायी
माँ-बाप की दुनिया, भाईयों का प्यार लायी
तब मैं ये सोच बैठी, ये घर है मेरा अपना
मुद्दत के बाद आखिर, पुरा हुआ है सपना|
इस को बनाया मैंने, इसको संवारा मैंने
मेहनत से रोज़-ओ-शब की, इसको निखारा मैंने
आंगन से घर के जैसे, कुछ फूल महक उठे
खुशियां से इन गुलों की, दिवार-ओ-दर भी मेहके|
हर लम्हा ज़िन्दगी का, इन्हीं को मैंने सौंपा
रतों की निंद दे दी, आराम दिन का सौंपा
शौहर की खिदमत में, ये जान-ओ-तन भी गँवाया
हुस्न-ओ-जवानी सेहत, और हुस्न-ए-ज़ुन गँवाया
इक रोज़ जो घर लौटे, तेवर थे उन्के बद्ले
ये कैनात बदली, और रोज़-ओ-शब भी बद्ले
कहने लगे मुझे वो, तंग आ गया हुँ तुम से
मीयार अपना खोया, घबरा गया हुँ तुम से
रहता हुँ तंग तुम से, होगा ना अब गुज़ारा
निकलो यहाँ से फौरन, कब है ये घर तुम्हरा
बच्चे भी उस के ठहरे, घर बार भी उसी का
दौलत भी उस की ठहरी, संसार भी उसी का
हैरान खढी हुँ, चौराहे पर अकेली
कोई मुझे बता दे, कौन सा घर है मेरा?









