jump to navigation

परोपकार की भावना May 5, 2008

Posted by pryas in हितोपदेश.
Tags: , , , ,
4 comments

पुराने जमाने की बात है। एक राजा ने दूसरे राजा के पास एक पत्र और सुरमे की एक छोटी सी डिबिया भेजी। पत्र में लिखा था कि जो सुरमा भिजवा रहा हूं, वह अत्यंत मूल्यवान है। इसे लगाने से अंधापन दूर हो जाता है। राजा सोच में पड़ गया। वह समझ नहीं पा रहा था कि इसे किस-किस को दे। उसके राज्य में नेत्रहीनों की संख्या अच्छी-खासी थी, पर सुरमे की मात्रा बस इतनी थी जिससे दो आंखों की रोशनी लौट सके।

राजा इसे अपने किसी अत्यंत प्रिय व्यक्ति को देना चाहता था। तभी राजा को अचानक अपने एक वृद्ध मंत्री की स्मृति हो आई। वह मंत्री बहुत ही बुद्धिमान था, मगर आंखों की रोशनी चले जाने के कारण उसने राजकीय कामकाज से छुट्टी ले ली थी और घर पर ही रहता था। राजा ने सोचा कि अगर उसकी आंखों की ज्योति वापस आ गई तो उसे उस योग्य मंत्री की सेवाएं फिर से मिलने लगेंगी। राजा ने मंत्री को बुलवा भेजा और उसे सुरमे की डिबिया देते हुए कहा, ‘इस सुरमे को आंखों में डालें। आप पुन: देखने लग जाएंगे। ध्यान रहे यह केवल 2 आंखों के लिए है।’ मंत्री ने एक आंख में सुरमा डाला। उसकी रोशनी आ गई। उस आंख से मंत्री को सब कुछ दिखने लगा। फिर उसने बचा-खुचा सुरमा अपनी जीभ पर डाल लिया।

यह देखकर राजा चकित रह गया। उसने पूछा, ‘यह आपने क्या किया? अब तो आपकी एक ही आंख में रोशनी आ पाएगी। लोग आपको काना कहेंगे।’ मंत्री ने जवाब दिया, ‘राजन, चिंता न करें। मैं काना नहीं रहूंगा। मैं आंख वाला बनकर हजारों नेत्रहीनों को रोशनी दूंगा। मैंने चखकर यह जान लिया है कि सुरमा किस चीज से बना है। मैं अब स्वयं सुरमा बनाकर नेत्रहीनों को बांटूंगा।’

राजा ने मंत्री को गले लगा लिया और कहा, ‘यह हमारा सौभाग्य है कि मुझे आप जैसा मंत्री मिला। अगर हर राज्य के मंत्री आप जैसे हो जाएं तो किसी को कोई दुख नहीं होगा।’

संकलन: त्रिलोक चंद्र जैन
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

दर्पण की सीख April 28, 2008

Posted by pryas in हितोपदेश.
Tags: , , , , , , ,
4 comments

पुराने जमाने की बात है। एक गुरुकुल के आचार्य अपने शिष्य की सेवा भावना से बहुत प्रभावित हुए। विद्या पूरी होने के बाद शिष्य को विदा करते समय उन्होंने आशीर्वाद के रूप में उसे एक ऐसा दिव्य दर्पण भेंट किया, जिसमें व्यक्ति के मन के भाव को दर्शाने की क्षमता थी। शिष्य उस दिव्य दर्पण को पाकर प्रसन्न हो उठा। उसने परीक्षा लेने की जल्दबाजी में दर्पण का मुंह सबसे पहले गुरुजी के सामने कर दिया। वह यह देखकर आश्चर्यचकित हो गया कि गुरुजी के हृदय में मोह, अहंकार, क्रोध आदि दुर्गुण परिलक्षित हो रहे थे। इससे उसे बड़ा दुख हुआ। वह तो अपने गुरुजी को समस्त दुर्गुणों से रहित सत्पुरुष समझता था।

दर्पण लेकर वह गुरुकूल से रवाना हो गया। उसने अपने कई मित्रों तथा अन्य परिचितों के सामने दर्पण रखकर परीक्षा ली। सब के हृदय में कोई न कोई दुर्गुण अवश्य दिखाई दिया। और तो और अपने माता व पिता की भी वह दर्पण से परीक्षा करने से नहीं चूका। उनके हृदय में भी कोई न कोई दुर्गुण देखा, तो वह हतप्रभ हो उठा। एक दिन वह दर्पण लेकर फिर गुरुकुल पहुंचा। उसने गुरुजी से विनम्रतापूर्वक कहा, ‘गुरुदेव, मैंने आपके दिए दर्पण की मदद से देखा कि सबके दिलों में नाना प्रकार के दोष हैं।’ तब गुरु जी ने दर्पण का रुख शिष्य की ओर कर दिया।

शिष्य दंग रह गया. क्योंकि उसके मन के प्रत्येक कोने में राग,द्वेष, अहंकार, क्रोध जैसे दुर्गुण विद्यमान थे। गुरुजी बोले, ‘वत्स यह दर्पण मैंने तुम्हें अपने दुर्गुण देखकर जीवन में सुधार लाने के लिए दिया था दूसरों के दुर्गुण देखने के लिए नहीं। जितना समय तुमने दूसरों के दुर्गुण देखने में लगाया उतना समय यदि तुमने स्वयं को सुधारने में लगाया होता तो अब तक तुम्हारा व्यक्तित्व बदल चुका होता। मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि वह दूसरों के दुर्गुण जानने में ज्यादा रुचि रखता है। वह स्वयं को सुधारने के बारे में नहीं सोचता। इस दर्पण की यही सीख है जो तुम नहीं समझ सके।’

संकलन : चंद्र सैन
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

सिग्नल पर होता मेकअप April 16, 2008

Posted by pryas in Uncategorized.
Tags: , , , , , , ,
comments closed

दफ्तर आते हुए ट्रैफिक सिग्नल पर एक अजीब सा नजारा देखा…

एक ३०-३२ वर्ष की गोरी-चिट्टी मोहतरमा अपनी लंबी सी गाडी में बैठी सिग्नल के हरे होने के इंतज़ार कर रही हैं. इंतजार कुछ लंबा है क्यों ना दर्पण से गुफ्तगु की जाये. बस रियर-व्यु मिरर्र में लगी अपना चेहरा निहारने और गाडी बन गयी ब्यूटी पार्लर.

तभी ठक-ठक की आवाज से उनकी एकाग्रता भंग हुई. देखा कोई २५-२८ साल का एक नौजवान, अपने दोनों हाथों और दोनों पैरों की साहयता से एक चौपाये की तरह चल रहा था, भीख माँग रहा था. उन मोहतरमा ने एक नफरत भरी नजर उस पर डाली और फिर लिप्स्टिक निकाल कर अपने होटों की आभा बढाने लगी.

Madam

मैं उनके लाल-गुलाबी चमकते होठों को निहार रहा था तभी मुझे उस भिखारी का ख्याल आया और मैंने उसके होटों की तरफ देखा. उसके सुखे होटों पर ना खत्म होने वाली एक प्यास थी. फिर उस सुंदरी ने आई-लाईनर लगा कर अपनी सुंदर आँखों को और सुंदर बनाया. मैने भिखारी की उनींदी और अलसाई आँखों की तरफ देखा, उनमें कुछ पाने की लालसा अभी भी दम साधे खडी थी. आँखों के बाद गालों का नम्बर आया. धूप से गुलाबी हुए गालों को और गुलाबी किया जा रहा था. भिखारी के पिचके और भीतर धंसे हुए गाल शायद गुलाबी गालों से इर्ष्या कर रहे थे.

इस दौरान कभी-कभी स्वप्न सुंदरी भिखारी की तरफ भी देख लेती थी शायद पूछ रही हो-कैसी लग रही हूँ? हल्की सी मुस्कुराहट के साथ हाथ अब रंग-बिरंगी बिंदी को एड्जैस्ट करने के लिये माथे पर पहुँच चुके थे. और वो भिखारी उसके हाथ भी माथे पर थे पसीना पोंछ रहा था या शायद अपनी तकदीर को एड्जैस्ट कर रहा था…पता नहीं.

तभी सिग्नल हरा हो गया और गाडी फर्राटे से निकल गयी. पता नहीं कितने सिग्नलों पर कितनी बार वह गाडी रुकेगी और कितनी बार वह अपने रूप को सँवारेगी और कितने ही भिखारीयों को उनके वाकई भिखारी होने का एहसास करवायेगी.

उस भीखारी को मैंने बहुत ध्यान से देखा था. उसके चेहरे पर एक सवाल मुँह बाये खडा था. क्यों भगवान, इतना फर्क क्यों किया? तूने अमीर को अमीर बनाया मुझे उससे शिकायत नहीं. किंतु कम-से-कम मेरे हाथ-पैर तो सलामत बना देता.

तभी ड्राईवर की आवाज से तंद्रा टूटी, “क्यों सर मजा आ गया”? मैं फीकी सी हँसी हँस दिया.

चित्र http://www.jupiterimages.com से लिया गया है
यदि किसी को इस पर आपत्ति होगी तो यह चित्र हटा दिया जायेगा.

ईश्वर का प्रमाण April 16, 2008

Posted by pryas in Uncategorized.
Tags: , , , , , , ,
2 comments

एक दिन एक राजा ने अपने सभासदों से कहा, ‘क्या तुम लोगों में कोई ईश्वर के होने का प्रमाण दे सकता है?’ सभासद सोचने लगे, अंत में एक मंत्री ने कहा, ‘महाराज, मैं कल इस प्रश्न का उत्तर लाने का प्रयास करूंगा।’ सभा समाप्त होने के बाद उत्तर की तलाश में वह मंत्री अपने गुरु के पास जा रहा था। रास्ते में उसे गुरुकुल का एक विद्यार्थी मिला। मंत्री को चिंतित देख उसने पूछा, ‘सब कुशल मंगल तो है? इतनी तेजी से कहां चले जा रहे हैं?’

मंत्री ने कहा, ‘गुरुजी से ईश्वर की उपस्थिति का प्रमाण पूछने जा रहा हूं।’ विद्यार्थी ने कहा, ‘इसके लिए गुरुजी को कष्ट देने की क्या आवश्यकता है ? इसका जवाब तो मैं ही दे दूंगा।’ अगले दिन मंत्री उस विद्यार्थी को लेकर राजसभा में उपस्थित हुआ और बोला, ‘महाराज यह विद्यार्थी आपके प्रश्न का उत्तर देगा।’ विद्यार्थी ने पीने के लिए एक कटोरा दूध मांगा। दूध मिलने पर वह उसमें उंगली डालकर खड़ा हो गया। थोड़ी-थोड़ी देर में वह उंगली निकालकर कुछ देखता, फिर उसे कटोरे में डालकर खड़ा हो जाता। जब काफी देर हो गई तो राजा नाराज होकर बोला, ‘दूध पीते क्यों नहीं? उसमें उंगली डालकर क्या देख रहे हो?’ विद्यार्थी ने कहा, ‘सुना है, दूध में मक्खन होता है, वही खोज रहा हूं।’ राजा ने कहा, ‘क्या इतना भी नहीं जानते कि दूध उबालकर उसे बिलोने से मक्खन मिलता है।’ विद्यार्थी ने मुस्कराकर कहा, ‘हे राजन, इसी तरह संसार में ईश्वर चारों ओर व्याप्त है, लेकिन वह मक्खन की भांति अदृश्य है। उसे तप से प्राप्त किया जाता है।’ राजा ने संतुष्ट होकर पूछा, ‘अच्छा बताओ कि ईश्वर करता क्या है?’

विद्यार्थी ने प्रश्न किया, ‘गुरु बनकर पूछ रहे हैं या शिष्य बनकर?’ राजा ने कहा, ‘शिष्य बनकर।’ विद्यार्थी बोला, ‘यह कौन सा आचरण है ? शिष्य सिंहासन पर है और गुरु जमीन पर।’ राजा ने झट विद्यार्थी को सिंहासन पर बिठा दिया और स्वयं नीचे खड़ा हो गया। तब विद्यार्थी बोला, ‘ईश्वर राजा को रंक और रंक को राजा बनाता है।’

संकलन: चतर सिंह ‘लुप्त’ पारसौली
साभार : नवभारत टाइम्स

साले, निकल ले यहाँ से बहुत पिटेगा… April 9, 2008

Posted by pryas in Uncategorized.
Tags: , , , , ,
9 comments

कल शाम करीब आठ बजे मैं घर पहुँचा तो मेरी डेढ साल की बेटी “पापा आ गये-पापा आ गये” की रट लगा कर गले से लिपट गयी और हमेशा की तरह जिद करने लगी, “पापा जी, बनाना खानी …हहहहै”. मैंने उसे गोद में उठाया और अपने घर के पास ही आचार्य निकेतन मार्केट की तरफ निकल पडा.

वह एक अच्छी मार्केट है जहाँ छोटी सी सडक के दोनों ओर रिक्शे वालों ने कब्जा जमा रखा है. उन रिक्शे वालों के पीछे फलों की रेहडीयाँ हैं. उन रेहडीयों के पीछे पक्की दुकानें हैं जिनकी आये दिन रिक्शे वालों और रेहडी वालों से तूतू-मैंमैं होती रहती है.

मै सडक पार करके रिक्शेवालों के बीच से रास्ता तलाश ही रहा था कि तभी एक दुपहिया वाहन ने, जिस पार हट्टे-कट्टे तीन लोग सवार थे, मुझे पीछे से टक्कर दे मारी. टक्कर लगते ही मैंने आगे जाते हुए एक रिक्शे को पकड कर बडी मुश्किल से अपने आप को गिरने से बचाया. मैंने गुस्से से पीछे मुड कर देखा तो दुपहिया चालक चिल्लाया, “क्यों बे दिखता नहीं है क्या?” मैं बोला भाई साहब दिख तो रहा हैं लेकिन आगे दिख रहा है पीछे से तो आप आ रहे हो आप को देखना चाहिये था. वह फिर गुर्राया,”अबे देखा था तभी तो रोक दिया, वरना सडक पर पडा होता.” मैं बोला भाई साहब इतना गरम क्यों होते हो आप खुद तीन-तीन लोगों को लेकर स्कुटर चला रहे हो, आपको देखना चाहिये मेरी गोद में बच्चा है. अबे तो बच्चे को कुछ हुआ तो नहीं और हाँ तू कार दिलवादे फिर तीन-तीन को लेकर नहीं चलुंगा. मन किया की बेटी को छोड कर एक झापड रसीद कर दूँ. लेकिन मैंने सोचा की छोडो यार क्या बात बढाना. लेकिन तब तक भीड ने उस दुपहिया चालक को घेर लिया और लगे उसे गाली निकालने. उस दुपहीया चालक की हालत बिगडने लगी थी. मैंने लोगों से कहा, कोई बात नहीं इसे जाने दें. लेकिन भीड में से कुछ समाज-सेवक अपने हाथों की ताकत आजमाना चाह रहे थे. बडी मुश्किल से मैंने उस दुपहिया चालक को वहाँ से निकलवाया. लेकिन वो भी कम न था जाते-जाते खिसीयाते हुए मुझे कहता, “साले, निकल ले यहाँ से बहुत पिटेगा”. उसकी इस बात पर मुझे हँसी आ गयी. मैंने सोचा, गलती भी करो, उसका एहसास भी ना करो, झगडा भी करो.. पता नहीं घर से क्या सोच कर निकलते हैं हम लोग.

तभी मेरी बेटी बोली,” पापा जी अंकल भाग गये, अंकल गंदे-अंकल गंदे”. मैं मुस्कुराया, बोला नही बेटा कोई गंदा नहीं होता और केले वाले की रेहडी की तरफ बढ चला.

बत्तीसवीं पुतली - रानी रुपवती April 7, 2008

Posted by pryas in सिंहासन बत्तीसी.
Tags: , , ,
2 comments

बत्तीसवीं पुतली रानी रुपवती ने राजा भोज को सिंहासन पर बैठने की कोई रुचि नहीं दिखाते देखा तो उसे अचरज हुआ। उसने जानना चाहा कि राजा भोज में आज पहले वाली व्यग्रता क्यों नहीं है। राजा भोज ने कहा कि राजा विक्रमादित्य के देवताओं वाले गुणों की कथाएँ सुनकर उन्हें ऐसा लगा कि इतनी विशेषताएँ एक मनुष्य में असम्भव हैं और मानते हैं कि उनमें बहुत सारी कमियाँ है। अत: उन्होंने सोचा है कि सिंहासन को फिर वैसे ही उस स्थान पर गड़वा देंगे जहाँ से इसे निकाला गया है।

राजा भोज का इतना बोलना था कि सारी पुतलियाँ अपनी रानी के पास आ गईं। उन्होंने हर्षित होकर राजा भोज को उनके निर्णय के लिए धन्यवाद दिया। पुतलियों ने उन्हें बताया कि आज से वे भी मुक्त हो गईं। आज से यह सिंहासन बिना पुतलियों का हो जाएगा। उन्होंने राजा भोज को विक्रमादित्य के गुणों का आंशिक स्वामी होना बतलाया तथा कहा कि इसी योग्यता के चलते उन्हें इस सिंहासन के दर्शन हो पाये। उन्होंने यह भी बताया कि आज से इस सिंहासन की आभा कम पड़ जाएगी और धरती की सारी चीजों की तरह इसे भी पुराना पड़कर नष्ट होने की प्रक्रिया से गुज़रना होगा।

इतना कहकर उन पुतलियों ने राजा से विदा ली और आकाश की ओर उड़ गईं। पलक झपकते ही सारी की सारी पुतलियाँ आकाश में विलीन हो गई।

पुतलियों के जाने के बाद राजा भोज ने कर्मचारियों को बुलवाया तथा गड्ढा खुदवाने का निर्देश दिया। जब मजदूर बुलवाकर गड़ढा खोद डाला गया तो वेद मन्त्रों का पाठ करवाकर पूरी प्रजा की उपस्थिति में सिंहासन को गड्ढे में दबवा दिया। मिट्टी डालकर फिर वैसा ही टीला निर्मित करवाया गया जिस पर बैठकर चरवाहा अपने फैसले देता था। लेकिन नया टीला वह चमत्कार नहीं दिखा सका जो पुराने वाले टीले में था।

उपसंहार- कुछ भिन्नताओं के साथ हर लोकप्रिय संस्करण में उपसंहार के रुप में एक कथा और मिलती है। उसमें सिंहासन के साथ पुन: दबवाने के बाद क्या गुज़रा- यह वर्णित है। आधिकारिक संस्कृत संस्करण में यह उपसंहार रुपी कथा नहीं भी मिल सकती है, मगर जन साधारण में काफी प्रचलित है।

कई साल बीत गए। वह टीला इतना प्रसिद्ध हो चुका था कि सुदूर जगहों से लोग उसे देखने आते थे। सभी को पता था कि इस टीले के नीचे अलौकिक गुणों वाला सिंहासन दबा पड़ा है। एक दिन चोरों के एक गिरोह ने फैसला किया कि उस सिंहासन को निकालकर उसके टुकड़े-टुकड़े कर बेच देना चाहते थे। उन्होंने टीले से मीलों पहले एक गड्ढा खोदा और कई महीनों की मेहनत के बाद सुरंग खोदकर उस सिंहासन तक पहुँचे। सिंहासन को सुरंग से बाहर लाकर एक निर्जन स्थान पर उन्होंने हथौड़ों के प्रहार से उसे तोड़ना चाहा। चोट पड़ते ही ऐसी भयानक चिंगारी निकलती थी कि तोड़ने वाले को जलाने लगती थी। सिंहासन में इतने सारे बहुमूल्य रत्न-माणिक्य जड़े हुए थे कि चोर उन्हें सिंहासन से अलग करने का मोह नहीं त्याग रहे थे।

सिंहासन पूरी तरह सोने से निर्मित था, इसलिए चोरों को लगता था कि सारा सोना बेच देने पर भी कई हज़ार स्वर्ण मुद्राएँ मिल जाएगीं और उनके पास इतना अधिक धन जमा हो जाएगा कि उनके परिवार में कई पुरखों तक किसी को कुछ करने की ज़रुरत नहीं पड़ेगी। वे सारा दिन प्रयास करते रहे मगर उनके प्रहारों से सिंहासन को रत्ती भर भी क्षति नहीं पहुँची। उल्टे उनके हाथ चिंगारियों से झुलस गए और चिंगारियों को बार-बार देखने से उनकी आँखें दुखने लगीं। वे थककर बैठ गए और सोचते-सोचते इस नतीजे पर पहुँचे कि सिंहासन भुतहा है। भुतहा होने के कारण ही राजा भोज ने इसे अपने उपयोग के लिए नहीं रखा। महल में इसे रखकर ज़रुर ही उन्हें कुछ परेशानी हुई होगी, तभी उन्होंने ऐसे मूल्यवान सिंहासन को दुबारा ज़मीन में दबवा दिया। वे इसका मोह राजा भोज की तरह ही त्यागने की सोच रहे थे। तभी उनका मुखिया बोला कि सिंहासन को तोड़ा नहीं जा सकता, पर उसे इसी अवस्था में उठाकर दूसरी जगह ले जाया जा सकता है।

चोरों ने उस सिंहासन को अच्छी तरह कपड़े में लपेट दिया और उस स्थान से बहुत दूर किसी अन्य राज्य में उसे उसी रुप में ले जाने का फैसला कर लिया। वे सिंहासन को लेकर कुछ महीनों की यात्रा के बाद दक्षिण के एक राज्य में पहुँचे। वहाँ किसी को उस सिंहासन के बारे में कुछ पता नहीं था। उन्होंने जौहरियों का वेश धरकर उस राज्य के राजा से मिलने की तैयारी की। उन्होंने राजा को वह रत्न जड़ित स्वर्ण सिंहासन दिखाते हुए कहा कि वे बहुत दूर के रहने वाले हैं तथा उन्होंने अपना सारा धन लगाकर यह सिंहासन तैयार करवाया है।

राजा ने उस सिंहासन की शुद्धता की जाँच अपने राज्य के बड़े-बड़े सुनारों और जौहरियों से करवाई। सबने उस सिंहासन की सुन्दरता और शुद्धता की तारीफ करते हुए राजा को वह सिंहासन खरीद लेने की सलाह दी। राजा ने चोरों को उसका मुँहमाँगा मूल्य दिया और सिंहासन अपने बैठने के लिए ले लिया। जब वह सिंहासन दरबार में लगाया गया तो सारा दरबार अलौकिक रोशनी से जगमगाने लगा। उसमें जड़े हीरों और माणिक्यों से बड़ी मनमोहक आभा निकल रहीं थी। राजा का मन भी ऐसे सिंहासन को देखकर अत्यधिक प्रसन्न हुआ। शुभ मुहू देखकर राजा ने सिंहासन की पूजा विद्वान पंडितों से करवाई और उस सिंहासन पर नित्य बैठने लगा।

सिंहासन की चर्चा दूर-दूर तक फैलने लगी। बहुत दूर-दूर से राजा उस सिंहासन को देखने के लिए आने लगे। सभी आने वाले उस राजा के भाग्य को धन्य कहते, क्योंकि उसे ऐसा अद्भुत सिंहासन पर बैठने का अवसर मिला था। धीरे-धीरे यह प्रसिद्धि राजा भोज के राज्य तक भी पहुँची। सिंहासन का वर्णन सुनकर उनको लगा कि कहीं विक्रमादित्य का सिंहासन न हो। उन्होंने तत्काल अपने कर्मचारियों को बुलाकर विचार-विमर्श किया और मज़दूर बुलवाकर टीले को फिर से खुदवाया। खुदवाने पर उनकी शंका सत्य निकली और सुरंग देखकर उन्हें पता चल गया कि चोरों ने वह सिंहासन चुरा लिया। अब उन्हें यह आश्चर्य हुआ कि वह राजा विक्रमादित्य के सिंहासन पर आरुढ़ कैसे हो गया। क्या वह राजा सचमुच विक्रमादित्य के समकक्ष गुणों वाला है?

उन्होंने कुछ कर्मचारियों को लेकर उस राज्य जाकर सब कुछ देखने का फैसला किया। काफी दिनों की यात्रा के बाद वहाँ पहुँचे तो उस राजा से मिलने उसके दरबार पहुँचे। उस राजा ने उनका पूरा सत्कार किया तथा उनके आने का प्रयोजन पूछा। राजा भोज ने उस सिंहासन के बारे में राजा को सब कुछ बताया। उस राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने कहा कि उसे सिंहासन पर बैठने में कभी कोई परेशानी नहीं हुई।

राजा भोज ने ज्योतिषियों और पंडितों से विमर्श किया तो वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि हो सकता है कि सिंहासन अब अपना सारा चमत्कार खो चुका हो। उन्होंने
कहा कि हो सकता है कि सिंहासन अब सोने का न हो तथा रत्न और माणिक्य काँच के टुकड़े मात्र हों।

उस राजा ने जब ऐसा सुना तो कहा कि यह असम्भव है। चोरों से उसने उसे खरीदने से पहले पूरी जाँच करवाई थी। लेकिन जब जौहरियों ने फिर से उसकी जाँच की तो उन्हें घोर आश्चर्य हुआ। सिंहासन की चमक फीकी पड़ गई थी तथा वह एकदम पीतल का हो गया था। रत्न-माणिक्य की जगह काँच के रंगीन टुकड़े थे। सिंहासन पर बैठने वाले राजा को भी बहुत आश्चर्य हुआ। उसने अपने ज्योतिषियों और पण्डितों से सलाह की तथा उन्हें गणना करने को कहा। उन्होंने काफी अध्ययन करने के बाद कहा कि यह चमत्कारी सिंहासन अब मृत हो गया है। इसे अपवित्र कर दिया गया और इसका प्रभाव जाता रहा।

उन्होंने कहा- “अब इस मृत सिंहासन का शास्रोक्त विधि से अंतिम संस्कार कर दिया जाना चाहिए। इसे जल में प्रवाहित कर दिया जाना चाहिए।”

उस राजा ने तत्काल अपने कर्मचारियों को बुलाया तथा मज़दूर बुलवा कर मंत्रोच्चार के बीच उस सिंहासन को कावेरी नदी में प्रवाहित कर दिया।

समय बीतता रहा। वह सिंहासन इतिहास के पन्नों में सिमटकर रह गया। लोक कथाओं और जन-श्रुतियों में उसकी चर्चा होती रही। अनेक राजाओं ने विक्रमादित्य का सिंहासन प्राप्त करने के लिए कालान्तर में एक से बढ़कर एक गोता खोरो को तैनात किया और कावेरी नदी को छान मारा गया। मगर आज तक उसकी झलक किसी को नहीं मिल पाई है। लोगों का विश्वास है कि आज भी विक्रमादित्य की सी खूबियों वाला अगर कोई शासक हो तो वह सिंहासन अपनी सारी विशेषताओं और चमक के साथ बाहर आ जाएगा।

सौजन्य : इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र

क्यों रोती है लडकियाँ? अपने जन्म पर April 3, 2008

Posted by pryas in Uncategorized.
1 comment so far

क्यों रोती है लडकियाँ?
अपने जन्म पर.

क्यों मुँह बनाती है दाई?
अब कुछ ना मिलेगा, सोचकर.

क्यों मुँह बनाती है माँ?
अपना जिगर का टुकडा, देखकर.

क्यों मुँह बनाता है बाप?
खर्च दहेज का, सोचकर.

और क्यों मुँह बनाता है भाई?
अपनी बहन को देखकर.

…कहता है मेरा मन
आज ये सोचकर,
कि काश,
लडकियाँ लगती,
पेडपर,
होती ज़रूरत जिसकी,
तो,
तोड लेते,
वरना . . . झड जाती, गिर जाती और मर जाती सुखकर.

कृपया नाम सुझावें April 2, 2008

Posted by pryas in Uncategorized.
6 comments

हमारी धर्म-पत्नी के भैया व दीदी को भगवान ने बेटी व बेटे से नवाजा है. तो हमारी धर्म-पत्नी जी ने उनके नाम सुझाने का कार्य हमें सौंपते हुए कहा है कि आप बडे हिन्दी वादी बनकर हिन्दी का राग अलापते फिरते हैं. जरा इन बच्चों का हिन्दी अथवा संसकृत में नाम सुझावें तो आपको मानें.

मेरी आप सभी ब्लागर भाईयों व बहनों से विनती है कि कृपया “त” (बेटी) व “र” (बेटा) अक्षर से हिन्दी अथवा संस्कृत में कोई नाम सुझावें ताकि हमारी धर्म-पत्नी हमें मान ले.

मैं सदैव आपका आभारी रहूँगा.

अहंकार कुबेर का March 27, 2008

Posted by pryas in हितोपदेश.
Tags: , , , , ,
3 comments

अहंकार

यह एक पौराणिक कथा है। कुबेर तीनों लोकों में सबसे धनी थे। एक दिन उन्होंने सोचा कि हमारे पास इतनी संपत्ति है, लेकिन कम ही लोगों को इसकी जानकारी है। इसलिए उन्होंने अपनी संपत्ति का प्रदर्शन करने के लिए एक भव्य भोज का आयोजन करने की बात सोची। उस में तीनों लोकों के सभी देवताओं को आमंत्रित किया गया।

भगवान शिव उनके इष्ट देवता थे, इसलिए उनका आशीर्वाद लेने वह कैलाश पहुंचे और कहा, प्रभो! आज मैं तीनों लोकों में सबसे धनवान हूं, यह सब आप की कृपा का फल है। अपने निवास पर एक भोज का आयोजन करने जा रहा हूँ, कृपया आप परिवार सहित भोज में पधारने की कृपा करे।

भगवान शिव कुबेर के मन का अहंकार ताड़ गए, बोले, वत्स! मैं बूढ़ा हो चला हूँ, कहीं बाहर नहीं जाता। कुबेर गिड़गिड़ाने लगे, भगवन! आपके बगैर तो मेरा सारा आयोजन बेकार चला जाएगा। तब शिव जी ने कहा, एक उपाय है। मैं अपने छोटे बेटे गणपति को तुम्हारे भोज में जाने को कह दूंगा। कुबेर संतुष्ट होकर लौट आए। नियत समय पर कुबेर ने भव्य भोज का आयोजन किया।

तीनों लोकों के देवता पहुंच चुके थे। अंत में गणपति आए और आते ही कहा, मुझको बहुत तेज भूख लगी है। भोजन कहां है। कुबेर उन्हें ले गए भोजन से सजे कमरे में। सोने की थाली में भोजन परोसा गया। क्षण भर में ही परोसा गया सारा भोजन खत्म हो गया। दोबारा खाना परोसा गया, उसे भी खा गए। बार-बार खाना परोसा जाता और क्षण भर में गणेश जी उसे चट कर जाते।

थोड़ी ही देर में हजारों लोगों के लिए बना भोजन खत्म हो गया, लेकिन गणपति का पेट नहीं भरा। वे रसोईघर में पहुंचे और वहां रखा सारा कच्चा सामान भी खा गए, तब भी भूख नहीं मिटी। जब सब कुछ खत्म हो गया तो गणपति ने कुबेर से कहा, जब तुम्हारे पास मुझे खिलाने के लिए कुछ था ही नहीं तो तुमने मुझे न्योता क्यों दिया था? कुबेर का अहंकार चूर-चूर हो गया।

संकलन : सुरेश सिंह
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

हार्दिक शुभकामनाएं!!! March 22, 2008

Posted by pryas in Uncategorized.
6 comments

होली के पावन पर्व पर आप सभी भाई-बहनों को परिवार सहित हार्दिक शुभकामनाएं!!!