आज कुछ अंग्रेजी शब्दों का हिन्दी अनुवाद प्राप्त करने शब्दकोष पर जाना हुआ. वहाँ मुखप्रष्ट पर कुछ शब्दों के हिन्दी अनुवाद दिखाई दिये. मुझे लगा कि शायद ये हिन्दी कम और उर्दू अनुवाद ज्यादा हैं.

शब्दकोष का हिन्दी अनुवाद
Jewel …………………. ज़ेवर
Privacy ………………. तख़लिया
Unfortunate ………. बेनसीब
Elegant ……………….. हसीन
Hair ……………………. ज़ुल्फ़
Lock ……………………. ज़ुल्फ़
Behaviour …………… सलूक
मुझे लगता है कि इनका हिन्दी अनुवाद यह होने चाहियें. कृपया आप बताएं क्या सही है. फिर मैं शब्दकोष पर इसकी शिकायत करूंगा.
मेरे अनुसार हिन्दी अनुवाद
Jewel …………………. गहना
Privacy ………………. गोपनीयता
Unfortunate ………. दुर्भाग्यपूर्ण
Elegant ……………….. सुरुचिपूर्ण
Hair ……………………. बाल
Lock ……………………. ताला
Behaviour …………… व्यवहार
Categories: Uncategorized
Tagged: शब्दकोष का हिन्दी अनुवाद क्या सही क्या गलत
हजारों देशी-विदेशी पर्यटक रोज दिल्ली घूमने आते हैं. दिल्ली में पर्यटक स्थलों की संख्या में पिछले दिनों बढोतरी हुई है. पूर्वी दिल्ली में जहाँ अक्षरधाम मंदिर और ओखला पक्षी अभयारण्य पार्क वहीं पश्चिमी दिल्ली में एडवैंचर आईलैंड मनोरंजन पार्क का विस्तार हुआ है. इसके अतिरिक्त रोज नए-नए माल और मल्टीप्लैक्स वजूद में आ रहे हैं. अगले वर्ष कामनवैल्थ गेम्स के चलते दिल्ली लाखों पर्यटकों के स्वागत के लिये तैयारी कर रही है. ऐसे में “दिल्ली – एक सपनों का शहर” एक ऐसी श्रंखला की शुरूआत है जिसमें हमें विभिन्न पर्यटक स्थलों की जानकारी मिलेगी और उनके इतिहास मे बारे करीब से जानने-समझने का मौका भी मिलेगा.
इस श्रंखला के दौराना अपका सहयोग सदैव वांछनीय है.
Categories: दिल्ली - एक सपनों का शहर
Tagged: akshardham temple, कामनवैल्थ गेम्स, दिल्ली - एक सपनों का शहर, commonwealth games, delhi a city of dream, delhi tourism, tourist delhi
यह घटना उस समय की है जब मानव का जन्म नहीं हुआ था। विधाता जब सूनी पृथ्वी को देखता तो उसे कुछ न कुछ कमी नजर आती और वह इस कमी की पूर्ति के लिए दिन-रात सोच में पड़ा रहता। आखिर विधाता ने चंद्रमा की मुस्कान, गुलाब की सुगंध, अमृत की माधुरी, जल की शीतलता, अग्नि की तपिश, पृथ्वी की कठोरता से मिट्टी का एक पुतला बनाकर उसमें प्राण फूंक दिए।
मिट्टी के पुतले में प्राण का संचार होते ही सब ओर चहचहाट व रौनक हो गई और घरौंदे महकने लगे। देवदूतों ने विधाता की इस अद्भुत रचना को देखा तो आश्चर्यचकित रह गए और विधाता से बोले, ‘यह क्या है?’ विधाता ने कहा, ‘यह जीवन की सर्वश्रेष्ठ कृति मानव है। अब इसी से जीवन चलेगा और वक्त आगे बढ़ेगा।’ विधाता की बात पूरी भी न हो पाई थी कि एक देवदूत बीच में ही बोल पड़ा, ‘क्षमा कीजिए प्रभु। लेकिन यह बात हमारी समझ से परे है कि आपने इतनी मेहनत कर एक मिट्टी को आकार दे दिया। उसमें प्राण फूंक दिए। मिट्टी तो तुच्छ से तुच्छ है, जड़ से भी जड़ है। मिट्टी की बजाय अगर आप सोने अथवा चांदी के आकार में यह सब करते तो ज्यादा अच्छा रहता।’
देवदूत की बात पर विधाता मुस्करा कर बोले, ‘यही तो जीवन का रहस्य है। मिट्टी के शरीर में मैंने संसार का सारा सुख-सौंदर्य, सारा वैभव उड़ेल दिया है। जड़ में आनंद का चैतन्य फूंक दिया है। इसका जैसे चाहे उपयोग करो। जो मानव मिट्टी के इस शरीर को महत्व देगा वह मिट्टी की जड़ता भोगेगा; जो इससे ऊपर उठेगा, उसे आनंद के परत-दर-परत मिलेंगे। लेकिन ये सब मिट्टी के घरौंदे की तरह क्षणिक हैं। इसलिए जीवन का प्रत्येक क्षण मूल्यवान है। तुम मिट्टी के अवगुणों को देखते हो उसके गुणों को नहीं। मिट्टी में ही अंकुर फूटते हैं और मेहनत से फसल लहलहाती है। सोने अथवा चांदी में कभी भी अंकुर नहीं फूट सकते। इसलिए मैंने मिट्टी के शरीर को कर्मक्षेत्र बनाया है।’
संकलन: रेनू सैनी
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित
नरेश का ब्लौग, पुरानी कहानीयां, पुरानी कहानीयों का ब्लौग, प्रयास, प्रयास का ब्लौग, भारत की कहानियाँ, भारत की पौराणिक कथाएं, यह भी खूब रही, हिन्दी ब्लौग, bharat ki kahaniyan, bharat ki puranik kahaniyan, hindi blog, naresh ka blog, naresh seo, pryas, pryas blog, purani kahani, purani kahaniyon ka blog, puranik kathaein, yah bhi khoob rahi, जीवन का रहस्य, चंद्रमा की मुस्कान, गुलाब की सुगंध, अमृत की माधुरी, जल की शीतलता, अग्नि की तपिश, पृथ्वी की कठोरता
Categories: हितोपदेश
भारत त्यौहारों का देश है। विभिन्न त्यौहारों पर अलग-अलग पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं. इसी प्रकार धनतेरस पर भी यमराज की एक कथा बहुत प्रचलित है। कथा कुछ इस प्रकार है।
पुराने जमाने में एक राजा हुए थे राजा हिम। उनके यहां एक पुत्र हुआ, तो उसकी जन्म-कुंडली बनाई गई। ज्योतिषियों ने कहा कि राजकुमार अपनी शादी के चौथे दिन सांप के काटने से मर जाएगा। इस पर राजा चिंतित रहने लगे। जब राजकुमार की उम्र 16 साल की हुई, तो उसकी शादी एक सुंदर, सुशील और समझदार राजकुमारी से कर दी गई। राजकुमारी मां लक्ष्मी की बड़ी भक्त थीं। राजकुमारी को भी अपने पति पर आने वाली विपत्ति के विषय में पता चल गया।
राजकुमारी काफी दृढ़ इच्छाशक्ति वाली थीं। उसने चौथे दिन का इंतजार पूरी तैयारी के साथ किया। जिस रास्ते से सांप के आने की आशंका थी, वहां सोने-चांदी के सिक्के और हीरे-जवाहरात आदि बिछा दिए गए। पूरे घर को रोशनी से जगमगा दिया गया। कोई भी कोना खाली नहीं छोड़ा गया यानी सांप के आने के लिए कमरे में कोई रास्ता अंधेरा नहीं छोड़ा गया। इतना ही नहीं, राजकुमारी ने अपने पति को जगाए रखने के लिए उसे पहले कहानी सुनाई और फिर गीत गाने लगी।
इसी दौरान जब मृत्यु के देवता यमराज ने सांप का रूप धारण करके कमरे में प्रवेश करने की कोशिश की, तो रोशनी की वजह से उनकी आंखें चुंधिया गईं। इस कारण सांप दूसरा रास्ता खोजने लगा और रेंगते हुए उस जगह पहुंच गया, जहां सोने तथा चांदी के सिक्के रखे हुए थे। डसने का मौका न मिलता देख, विषधर भी वहीं कुंडली लगाकर बैठ गया और राजकुमारी के गाने सुनने लगा। इसी बीच सूर्य देव ने दस्तक दी, यानी सुबह हो गई। यम देवता वापस जा चुके थे। इस तरह राजकुमारी ने अपनी पति को मौत के पंजे में पहुंचने से पहले ही छुड़ा लिया। यह घटना जिस दिन घटी थी, वह धनतेरस का दिन था, इसलिए इस दिन को ‘यमदीपदान’ भी कहते हैं। भक्तजन इसी कारण धनतेरस की पूरी रात रोशनी करते हैं।
धनतेरस की कहानी, भारत के त्यौहार, भारत की पौराणिक कथाएं, राजा हिम, सोने-चांदी, धन तेरस, दिवाली धनतेरस, पुरानी कहानीयां, भारत की कहानियाँ, दिवाली मुबारक, दिपावली मुबारक, यमदीपदान, यमदीपन की कथा, मां लक्ष्मी, नरेश का ब्लौग, हिन्दी ब्लौग, पुरानी कहानीयों का ब्लौग, यह भी खूब रही, प्रयास,प्रयास का ब्लौग, dhanteres ki kahani, bharat ke tyohaar, bharat ki puranik kahaniyan, puranik kathaein, raja him, sona chandi, dhan teres, diwali dhanters, purani kahani, bharat ki kahaniyan, diwali mubarak, dipawali mubarak, yamdipdaan, yamdipdaan ki katha, maan laxmi, naresh ka blog, hindi blog, purani kahaniyon ka blog, naresh seo, yah bhi khoob rahi, pryas blog, pryas
Categories: हितोपदेश
Tagged: दिपावली मुबारक, दिवाली धनतेरस, दिवाली मुबारक, धन तेरस, धनतेरस की कहानी, नरेश का ब्लौग, पुरानी कहानीयां, पुरानी कहानीयों का ब्लौग, प्रयास, प्रयास का ब्लौग, भारत की कहानियाँ, भारत की पौराणिक कथाएं, भारत के त्यौहार, मां लक्ष्मी, यमदीपदान, यमदीपन की कथा, यह भी खूब रही, राजा हिम, सोने-चांदी, हिन्दी ब्लौग, bharat ke tyohaar, bharat ki kahaniyan, bharat ki puranik kahaniyan, dhan teres, dhanteres ki kahani, dipawali mubarak, diwali dhanters, diwali mubarak, hindi blog, maan laxmi, naresh ka blog, naresh seo, pryas, pryas blog, purani kahani, purani kahaniyon ka blog, puranik kathaein, raja him, sona chandi, yah bhi khoob rahi, yamdipdaan, yamdipdaan ki katha
तीनों लोकों में राधा की स्तुति से देवर्षि नारद खीझ गए थे। उनकी शिकायत थी कि वह तो कृष्ण से अथाह प्रेम करते हैं फिर उनका नाम कोई क्यों नहीं लेता, हर भक्त ‘राधे-राधे’ क्यों करता रहता है। वह अपनी यह व्यथा लेकर श्रीकृष्ण के पास पहुंचे।
नारदजी ने देखा कि श्रीकृष्ण भयंकर सिर दर्द से कराह रहे हैं। देवर्षि के हृदय में भी टीस उठी। उन्होंने पूछा, ‘भगवन! क्या इस सिर दर्द का कोई उपचार है। मेरे हृदय के रक्त से यह दर्द शांत हो जाए तो मैं अपना रक्त दान कर सकता हूं।’ श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया, ‘नारदजी, मुझे किसी के रक्त की आवश्यकता नहीं है। मेरा कोई भक्त अपना चरणामृत यानी अपने पांव धोकर पिला दे, तो मेरा दर्द शांत हो सकता है।’
नारद ने मन में सोचा, ‘भक्त का चरणामृत, वह भी भगवान के श्रीमुख में। ऐसा करने वाला तो घोर नरक का भागी बनेगा। भला यह सब जानते हुए नरक का भागी बनने को कौन तैयार हो?’ श्रीकृष्ण ने नारद से कहा कि वह रुक्मिणी के पास जाकर सारा हाल सुनाएं तो संभवत: रुक्मिणी इसके लिए तैयार हो जाएं। नारदजी रुक्मिणी के पास गए। उन्होंने रुक्मिणी को सारा वृत्तांत सुनाया तो रुक्मिणी बोलीं, ‘नहीं, नहीं! देवर्षि, मैं यह पाप नहीं कर सकती।’
नारद ने लौटकर रुक्मिणी की बात श्रीकृष्ण के पास रख दी। अब श्रीकृष्ण ने उन्हें राधा के पास भेजा। राधा ने जैसे ही सुना, तत्काल एक पात्र में जल लाकर उसमें अपने दोनों पैर डुबोए। फिर वह नारद से बोली, ‘देवर्षि, इसे तत्काल श्रीकृष्ण के पास ले जाइए। मैं जानती हूं कि भगवान को अपने पांव धोकर पिलाने से मुझे रौरव नामक नरक में भी ठौर नहीं मिलेगा। पर अपने प्रियतम के सुख के लिए मैं अनंत युगों तक नरक की यातना भोगने को तैयार हूं।’ अब देवर्षि समझ गए कि तीनों लोकों में राधा के प्रेम के स्तुतिगान क्यों हो रहे हैं। उन्होंने भी अपनी वीणा उठाई और राधा की स्तुति गाने लगे।
संकलन: बेला गर्ग
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित
भक्त, भगवान, भक्त और भगवान, देवर्षि नारद, श्रीकृष्ण, रुक्मिणी, नरक की यातना, पुरानी कहानीयां, बेताल पच्चीसी, सिंहासन बत्तीसी, प्रयास, यह भी खूब रही, bhakt, bhagwan, bhakt aur bhagwan, devrishi narad, sri krishna, rukmini, narak ki yatna, purani kahaniyan, betal pachisi, singhasan batisi, pryas, yah bhi khoob rahi, naresh seo, naresh delhi
Categories: हितोपदेश
Tagged: देवर्षि नारद, नरक की यातना, पुरानी कहानीयां, प्रयास, बेताल पच्चीसी, भक्त, भक्त और भगवान, भगवान, यह भी खूब रही, रुक्मिणी, श्रीकृष्ण, सिंहासन बत्तीसी, betal pachisi, bhagwan, bhakt, bhakt aur bhagwan, devrishi narad, narak ki yatna, naresh delhi, naresh seo, pryas, purani kahaniyan, rukmini, singhasan batisi, sri krishna, yah bhi khoob rahi
September 24, 2009 · 2 Comments
बात उन दिनों की है जब महाराज युधिष्ठिर इंद्रप्रस्थ पर राज्य करते थे। राजा होने के नाते वे काफी दान आदि भी करते थे। धीरे-धीरे उनकी प्रसिद्धि दानवीर के रूप में फैलने लगी और पांडवों को इसका अभिमान होने लगा।
कहते हैं कि भगवान दर्पहारी हैं। अपने भक्तों का अभिमान तो उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं। एक बार कृष्ण इंद्रप्रस्थ पहुंचे। भीम व अर्जुन ने युधिष्ठिर की प्रशंसा शुरू की कि वे कितने बड़े दानी हैं। तब कृष्ण ने उन्हें बीच में ही टोक दिया और कहा, लेकिन हमने कर्ण जैसा दानवीर और नहीं सुना। पांडवों को यह बात पसंद नहीं आई। भीम ने पूछ ही लिया, कैसे? कृष्ण ने कहा कि समय आने पर बतलाऊंगा।
बात आई गई हो गई। कुछ ही दिनों में सावन प्रारंभ हो गया व वर्षा की झड़ी लग गई। उस समय एक याचक युधिष्ठिर के पास आया और बोला, महाराज! मैं आपके राज्य में रहने वाला एक ब्राह्मण हूं और मेरा व्रत है कि बिना हवन किए कुछ भी नहीं खाता-पीता। कई दिनों से मेरे पास यज्ञ के लिए चंदन की लकड़ी नहीं है। यदि आपके पास हो तो, मुझ पर कृपा करें, अन्यथा हवन तो पूरा नहीं ही होगा, मैं भी भूखा-प्यासा मर जाऊंगा।
युधिष्ठिर ने तुरंत कोषागार के कर्मचारी को बुलवाया और कोष से चंदन की लकड़ी देने का आदेश दिया। संयोग से कोषागार में सूखी लकड़ी नहीं थी। तब महाराज ने भीम व अर्जुन को चंदन की लकड़ी का प्रबंध करने का आदेश दिया। लेकिन काफी दौड़- धूप के बाद भी सूखी लकड़ी की व्यवस्था नहीं हो पाई। तब ब्राह्मण को हताश होते देख कृष्ण ने कहा, मेरे अनुमान से एक स्थान पर आपको लकड़ी मिल सकती है, आइए मेरे साथ।
ब्राह्मण की आखों में चमक आ गई। भगवान ने अर्जुन व भीम को भी इशारा किया, वेष बदलकर वे भी ब्राह्मण के संग हो लिए। कृष्ण सबको लेकर कर्ण के महल में गए। सभी ब्राह्मणों के वेष में थे, अत: कर्ण ने उन्हें पहचाना नहीं। याचक ब्राह्मण ने जाकर लकड़ी की अपनी वही मांग दोहराई। कर्ण ने भी अपने भंडार के मुखिया को बुलवा कर सूखी लकड़ी देने के लिए कहा, वहां भी वही उत्तर प्राप्त हुआ।
ब्राह्मण निराश हो गया। अर्जुन-भीम प्रश्न-सूचक निगाहों से भगवान को ताकने लगे। लेकिन वे अपनी चिर-परिचित मुस्कान लिए बैठे रहे। तभी कर्ण ने कहा, हे देवता! आप निराश न हों, एक उपाय है मेरे पास। उसने अपने महल के खिड़की-दरवाजों में लगी चंदन की लकड़ी काट-काट कर ढेर लगा दी, फिर ब्राह्मण से कहा, आपको जितनी लकड़ी चाहिए, कृपया ले जाइए। कर्ण ने लकड़ी पहुंचाने के लिए ब्राह्मण के साथ अपना सेवक भी भेज दिया।
ब्राह्मण लकड़ी लेकर कर्ण को आशीर्वाद देता हुआ लौट गया। पांडव व श्रीकृष्ण भी लौट आए। वापस आकर भगवान ने कहा, साधारण अवस्था में दान देना कोई विशेषता नहीं है, असाधारण परिस्थिति में किसी के लिए अपने सर्वस्व को त्याग देने का ही नाम दान है। अन्यथा चंदन की लकड़ी के खिड़की-द्वार तो आपके महल में भी थे।
इस कहानी का तात्पर्य यह है कि हमें ऐसे कार्य करने चाहिए कि हम उस स्थिति तक पहुंच जाएं जहां पर स्वाभाविक रूप से जीव भगवान की सेवा करता है। हमें भगवान को देखने की चेष्टा नहीं करनी चाहिए, बल्कि अपने को ऐसे कार्यों में संलग्न करना चाहिए कि भगवान स्वयं हमें देखें। केवल एक गुण या एक कार्य में अगर हम पूरी निष्ठा से अपने को लगा दें, तो कोई कारण नहीं कि भगवान हम पर प्रसन्न न हों। कर्ण ने कोई विशेष कार्य नहीं किया, किंतु उसने अपना यह नियम भंग नहीं होने दिया कि उसके द्वार से कोई निराश नहीं लौटेगा।
महाराज युधिष्ठिर, चंदन की लकड़ी, ब्राह्मण, भगवान कृष्ण, यह भी खूब रही, नरेश का ब्लौग, प्रयास का ब्लौग, maharaj yudhishtir, chandan ki lakdi, brahamin, bhagwan krisna, yaha bhi khoob rahi, naresh ka blog, pryas ka blog, naresh seo, delhi seo, purani kahaniyan, पुरानी कहानियाँ
Categories: हितोपदेश
Tagged: चंदन की लकड़ी, नरेश का ब्लौग, पुरानी कहानियाँ, प्रयास का ब्लौग, ब्राह्मण, भगवान कृष्ण, महाराज युधिष्ठिर, यह भी खूब रही, bhagwan krisna, brahamin, chandan ki lakdi, delhi seo, maharaj yudhishtir, naresh ka blog, naresh seo, pryas ka blog, purani kahaniyan, yaha bhi khoob rahi
September 16, 2009 · 4 Comments
एक बार ब्रह्माजी दुविधा में पड़ गए। लोगों की बढ़ती साधना वृत्ति से वह प्रसन्न तो थे पर इससे उन्हें व्यावहारिक मुश्किलें आ रही थीं। कोई भी मनुष्य जब मुसीबत में पड़ता, तो ब्रह्माजी के पास भागा-भागा आता और उन्हें अपनी परेशानियां बताता। उनसे कुछ न कुछ मांगने लगता। ब्रहाजी इससे दुखी हो गए थे। अंतत: उन्होंने इस समस्या के निराकरण के लिए देवताओं की बैठक बुलाई और बोले, ‘देवताओं, मैं मनुष्य की रचना करके कष्ट में पड़ गया हूं। कोई न कोई मनुष्य हर समय शिकायत ही करता रहता है, जिससे न तो मैं कहीं शांति पूर्वक रह सकता हूं, न ही तपस्या कर सकता हूं। आप लोग मुझे कृपया ऐसा स्थान बताएं जहां मनुष्य नाम का प्राणी कदापि न पहुंच सके।’
ब्रह्माजी के विचारों का आदर करते हुए देवताओं ने अपने-अपने विचार प्रकट किए। गणेश जी बोले, ‘आप हिमालय पर्वत की चोटी पर चले जाएं।’ ब्रह्माजी ने कहा, ‘यह स्थान तो मनुष्य की पहुंच में है। उसे वहां पहुंचने में अधिक समय नहीं लगेगा।’ इंद्रदेव ने सलाह दी कि वह किसी महासागर में चले जाएं। वरुण देव बोले ‘आप अंतरिक्ष में चले जाइए।’
ब्रह्माजी ने कहा, ‘एक दिन मनुष्य वहां भी अवश्य पहुंच जाएगा।’ ब्रह्माजीनिराश होने लगे थे। वह मन ही मन सोचने लगे, ‘क्या मेरे लिए कोई भी ऐसा गुप्त स्थान नहीं है, जहां मैं शांतिपूर्वक रह सकूं।’ अंत में सूर्य देव बोले, ‘आप ऐसा करें कि मनुष्य के हृदय में बैठ जाएं। मनुष्य इस स्थान पर आपको ढूंढने में सदा उलझा रहेगा।’ ब्रह्माजी को सूर्य देव की बात पसंद आ गई। उन्होंने ऐसा ही किया। वह मनुष्य के हृदय में जाकर बैठ गए। उस दिन से मनुष्य अपना दुख व्यक्त करने के लिए ब्रह्माजीको ऊपर ,नीचे, दाएं, बाएं, आकाश, पाताल में ढूंढ रहा है पर वह मिल नहीं रहे। मनुष्य अपने भीतर बैठे हुए देवता को नहीं देख पा रहा है।
संकलन-विजय कुमार सिहं
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित
ईश्वर का स्थान, ब्रह्माजी, हिमालय पर्वत, सूर्यदेव, इंद्रदेव, गणेश जी, ishwar ka sthan, brahma ji, himalaya, suryadev, indradev, ganesh ji, pryas, yah bhi khoob rahi, naresh ka blog, naresh seo, seo naresh, प्रयास, यह भी खूब रही, नरेश का ब्लौग पुरानी कहानीयाँ, विक्रम बेताल, सिंहासन बत्तीसी, purani kahaniya, vikram betal, singhasan battissi
Categories: हितोपदेश
Tagged: इंद्रदेव, ईश्वर का स्थान, गणेश जी, नरेश का ब्लौग पुरानी कहानीयाँ, प्रयास, ब्रह्माजी, यह भी खूब रही, विक्रम बेताल, सिंहासन बत्तीसी, सूर्यदेव, हिमालय पर्वत, brahma ji, ganesh ji, himalaya, indradev, ishwar ka sthan, naresh ka blog, naresh seo, pryas, purani kahaniya, seo naresh, singhasan battissi, suryadev, vikram betal, yah bhi khoob rahi
एक बार काशी के निकट के एक इलाके के नवाब ने गुरु नानक से पूछा, ‘आपके प्रवचन का महत्व ज्यादा है या हमारी दौलत का?‘ नानक ने कहा, ‘इसका जवाब उचित समय पर दूंगा।’ कुछ समय बाद नानक ने नवाब को काशी के अस्सी घाट पर एक सौ स्वर्ण मुद्राएं लेकर आने को कहा। नानक वहां प्रवचन कर रहे थे। नवाब ने स्वर्ण मुद्राओं से भरा थाल नानक के पास रख दिया और पीछे बैठ कर प्रवचन सुनने लगा। वहां एक थाल पहले से रखा हुआ था। प्रवचन समाप्त होने के बाद नानक ने थाल से स्वर्ण मुद्राएं मुट्ठी में लेकर कई बार खनखनाया। भीड़ को पता चल गया कि स्वर्ण मुद्राएं नवाब की तरफ से नानक को भेंट की गई हैं।
थोड़ी देर बाद अचानक नानक ने थाल से स्वर्ण मुद्राएं उठा कर गंगा में फेंकना शुरू कर दिया। यह देख कर वहां अफरातफरी मच गई। कई लोग स्वर्ण मुदाएं लेने के लिए गंगा में कूद गए। भगदड़ में कई लोग घायल हो गए। मारपीट की नौबत आ गई। नवाब को समझ में नहीं आया कि आखिर नानक ने यह सब क्यों किया। तभी नानक ने जोर से कहा, ‘भाइयों, असली स्वर्ण मुद्राएं मेरे पास हैं। गंगा में फेंकी गई मुदाएं नकली हैं। आप लोग शांति से बैठ जाइए।’ जब सब लोग बैठ गए तो नवाब ने पूछा, ‘आप ने यह तमाशा क्यों किया? धन के लालच में तो लोग एक दूसरे की जान भी ले सकते हैं।’ नानक ने कहा, ‘मैंने जो कुछ किया वह आपके प्रश्न का उत्तर था। आप ने देख लिया कि प्रवचन सुनते समय लोग सब कुछ भूल कर भक्ति में डूब जाते हैं। लेकिन माया लोगों को सर्वनाश की ओर ले जाती है। प्रवचन लोगों में शांति और सद्भावना का संदेश देता है मगर दौलत तो विखंडन का रास्ता है।‘ नवाब को अपनी गलती का अहसास हो गया।
संकलन: सुरेश सिंह
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित
गुरू नानक, नवाब, स्वर्ण मुद्राएं, शांति, सद्भावना, दौलत, नरेश का ब्लौग, नरेश, guru nanak, nawab, swarn mudra, shanti, daulat, naresh ka blog, naresh, naresh seo, pryas, yah bhi khoob rahi, प्रयास, प्रयास का ब्लौग, यह भी खूब रही
Categories: हितोपदेश
Tagged: चिट्ठा, नरेश, नरेश का ब्लौग, पुरानी कहानीयाँ, प्रयास, यह भी खूब रही, सिंहासन बत्तीसी, हिन्दी चिट्ठा, naresh, naresh blog, naresh delhi, pryas, pryas blog, yah bhi khoob rahi
दिल्ली के एक बादशाह अपनी प्रजा के सुख-दुख का बड़ा ख्याल रखते थे। वह हर समय आम आदमी के विकास की बात सोचते रहते थे। एक रात वह टहल रहे थे, तभी अचानक उनकी नजर शाही खजाने की तरफ गई। उन्होंने थोड़ा और आगे बढ़कर देखा तो पाया कि खजाने की बत्तियां जली हुई हैं। बत्ती जलती देखकर बादशाह खजाने की तरफ बढ़ चले। वहां जाने पर उन्होंने देखा कि खजांची कुछ हिसाब-किताब कर रहे हैं। उन्होंने खजांची से पूछा, ‘क्या बात है? आज सोना नहीं है? आधी रात हो गई और तुम अब तक यहीं पर बैठे-बैठे हिसाब-किताब कर रहे हो।’ बादशाह की बात पर खजांची बोला, ‘जहांपनाह, हिसाब कुछ बढ़ गया है इसलिए मैं दोबारा गिनती कर रहा हूं और यह पता लगाने की कोशिश कर रहा हूं कि आखिर किसका अतिरिक्त धन हमारे खजाने में आ गया है।’
बादशाह खजांची की इस बात पर बोले, ‘ठीक है, किसी का पैसा खजाने में आ गया होगा। लेकिन यह काम तो तुम कल सुबह भी कर सकते हो। अभी तो बहुत रात हो गई है। काम बंद करो और अपने घर जाकर आराम करो।’ इस पर खजांची ने जवाब दिया, ‘आप ठीक कह रहे हैं। यह काम मैं कल भी कर सकता हूं। मगर जिसके पैसे हमारे पास आ गए हैं वह आदमी तो बेहद परेशान हो रहा होगा फिर वह मन ही मन बद्दुआ भी दे रहा होगा। मैं नहीं चाहता कि उसकी बद्दुआ हुकूमत को लगे। इसलिए मैं अभी हिसाब साफ करना चाहता हूं ताकि उस शख्स को सुबह होते ही पैसे लौटा सकूं। मैं नहीं चाहता कि कोई यह समझे कि यहां किसी भी मामले में कार्रवाई देर से होती है।’ बादशाह खजांची की बात सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले, ‘जिस राज्य में तुम जैसा वफादार व ईमानदार खजांची हो उसे तरक्की की ओर जाने से कोई नहीं रोक सकता।’ बादशाह खजांची की पीठ थपथपाकर लौट गए।
संकलन: रेनू सैनी
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित
प्रयास ब्लौग, वफादार खजांची, जहांपनाह, pryas, यह भी खूब रही, yah bhi khoob rahi, naresh blog, naresh hindi blog, naresh ka blog, हिन्दी चिट्ठा, हिन्दी ब्लौग, बेताल पच्चीसी, पुरानी कहानीयाँ, नरेश ब्लौग, नरेश का ब्लौग purani kahaniyan
Categories: हितोपदेश
Tagged: 'जहांपनाह, पुरानी कहानीयाँ, प्रयास ब्लौग, बेताल पच्चीसी, यह भी खूब रही, वफादार खजांची, हिन्दी चिट्ठा, हिन्दी ब्लौग, naresh blog, naresh hindi blog, naresh ka blog, pryas, yah bhi khoob rahi
मेवाड़ के महाराणा अपने एक नौकर को हमेशा अपने साथ रखते थे, चाहे युद्ध का मैदान हो, मंदिर हो या शिकार पर जाना हो। एक बार वह अपने इष्टदेव एकलिंग जी के दर्शन करने गए। उन्होंने हमेशा की तरह उस नौकर को भी साथ ले लिया। दर्शन कर वे तालाब के किनारे घूमने निकल गए। उन्हें एक पेड़ पर ढेर सारे पके आम दिखाई दिए। उन्होंने एक आम लेकर चार फांकें बनाईं। एक फांक नौकर को देते हुए कहा, ‘बताओ, इसका कैसा स्वाद है?‘ आम खाकर नौकर ने कहा ‘महाराज! बहुत मीठा है। ऐसा मीठा आम तो मैंने कभी खाया ही नहीं। कृपया एक और देने की कृपा करें।’
महाराणा ने एक फांक और दे दी। नौकर ने उसे भी पहले की तरह मजे लेकर खाया और कहा, ‘वाह! क्या स्वाद है! मजा आ गया। मेहरबानी करके एक और दे दीजिए।’ महाराणा को हैरत हुई। उन्हें उसके व्यवहार में थोड़ी अस्वाभाविकता नजर आई। लेकिन वह उनका प्रिय सेवक था जिससे वह काफी स्नेह करते थे। इसलिए उसकी इस मांग को पूरा करने में उन्हें कोई संकोच नहीं हुआ। उन्होंने तीसरी फांक भी दे दी। उसे खाते ही नौकर बोला, ‘यह तो बिल्कुल अमृत फल है। यह भी दे दीजिए।’ उसने अंतिम फांक भी मांग ली। लेकिन इस बार महाराणा को गुस्सा आ गया। उन्होंने कहा, ‘तुम्हें शर्म नहीं आती। तुम्हें सब कुछ पहले मिलता है तब भी तुम इतनी हिम्मत कर रहे हो मेरे सामने?’
यह कहते हुए महाराणा ने वह फांक अपने मुंह में रख ली लेकिन तुरंत उगल दिया। वह बोले, ‘इतना खट्टा आम खाकर भी तुम कहते रहे कि यह मीठा है, अमृत तुल्य है, क्या स्वाद है। क्यों कहा ऐसा?’ नौकर बोला, ‘महाराज! जीवन भर आप मीठे आम देते रहे हैं। आज खट्टा आम आ गया तो कैसे कहूं कि यह खट्टा है, ऐसा कहना, मेरी कृतघ्नता नहीं होती?’ महाराणा ने उसे गले से लगा लिया और उसे पुरस्कृत किया।
संकलन : बेला गर्ग
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित
तुम्हें शर्म नहीं आती, इष्टदेव एकलिंग जी, खट्टा आम, नरेश, नरेश का ब्लौग, प्रयास, प्रयास ब्लौग, मजे लेकर खाया, महाराज बहुत मीठा है, मेवाड़ के महाराणा, यह भी खूब रही, सेवक का बड़प्पन, हिन्दी ब्लौग, hindi blog, pryas, yah bhi khoob rahi
Categories: हितोपदेश
Tagged: 'तुम्हें शर्म नहीं आती, इष्टदेव एकलिंग जी, खट्टा आम, नरेश, नरेश का ब्लौग, प्रयास, प्रयास ब्लौग, मजे लेकर खाया, महाराज बहुत मीठा है, मेवाड़ के महाराणा, यह भी खूब रही, सेवक का बड़प्पन, हिन्दी ब्लौग, hindi blog, pryas, yah bhi khoob rahi